नींद

कुछ दिन हुए
नींद ग़ायब सी हो गई है इन आँखों से
ठीक ठीक वजह तो पता नहीं शायद
तेरे इंतज़ार में रात भर जागी रहती हैं ये आजकल.

हिचकियाँ

कुछ दिन हुए
हिचकियों ने फिर से सताना शुरू किया है मुझे
लगता है मेरी यादों पे जो वक़्त की धुल जम गई थी
जाने अनजाने या फिर किसी बहाने साफ़ कर दी है तुमने.

दिल

कुछ दिन हुए
इस दिल ने फिर से सवाल करना सीख लिया है
फिर से धड़कना सीख लिया है
कुछ कहने भी लगा है
ख़ुदा जाने क्या पूछता है, क्या कहता है
किसके लिए धड़कता है
मगर जो भी है
हर बार एक सुकू जरूर मिलता है.

 

तेरा दिल

खोया, खोया
तनहा, तनहा
गुमसुम, गुमसुम
हर पल, हर घडी
अब ये रहने लगा है…
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

थोडा कुछ ये कहता है, थोडा कुछ में सुनता हूँ
अजनबी, अनजाना मीठा सा एक दर्द
अब इस दिल में रिसने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

कुछ अधूरी-अनकही सी कहानियाँ
फिर से बनने लगी है
ठंडी-ठंडी सर्द हवाएं फिर से चलने लगी है.
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

खोया, खोया
तनहा, तनहा
गुमसुम, गुमसुम
हर पल, हर घडी
अब ये रहने लगा है…
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

वक़्त

अगर यह वक़्त कभी ठहरा कहीं
तो पूछुगा में उससे
क्यूँ हर दम भागता रहता है तू
क्या कहीं पहुचने की जल्दी है तुझे.

दिल

चार दीवारे खड़ी कर ली हैं उसने अपने दिल के आसपास
लगता है डरने लगा है इस डर से के कहीं फिर से कोई अजनबी घर ना बना ले वहां.

फुर्सत

वक़्त से उधार मांग लाया हूँ कुछ चुनिन्दा लम्हे हमारे लिए
थोड़ी फुर्सत निकाल लेना, हो सके तो कुछ लम्हे साथ जी लेंगे.

 

आँखें

दोस्तों कर रहा हूँ नीलाम यह आँखें
ख़रीदो क्या?

इन आँखों ने देखी हैं
कई सदियाँ और सदियों से जुडी कहानियाँ

इन आँखों ने देखी है
अलिफ़ और लैला की जवानियाँ
कई विक्रम और बैताल की सीख देती कहानियाँ.

इन आँखों ने देखी है
गुलज़ार के नगमो से सजी
मोगली और माँ की गोदी में छुपे गोपाल की नटखट शैतानियाँ

इन आँखों ने देखी है
बॉर्डर पे खड़े सिपाही भाइयों
की देश पे न्योछावर जवानियाँ

इन आँखों ने और भी
बहुत कुछ देखा है
और जो नहीं देखा
देख लेंगी तुम्हारे साथ.

कुछ बातें

कुछ ज़ज्बात बचा लिए थे मैंने
हमारी पिछली मुलाक़ात से
शायद इसी उम्मीद में के अगली मुलाक़ात में बयां कर दूंगा
हाले-दिल पर वो मुमकिन हो ना सका.

क्योँ कदम दो कदम साथ चलने की ख्वाहिश
ख्वाहिश ही रह गई
क्योँ बरसों से प्यासी दिल ही इस जमीं पर
तेरे प्यार की कुछ बूंदें गिर ना पाई
क्योँ तेरी पलकों पे अंगड़ाइयाँ लेते हज़ारों ख्व़ाब
इन आँखों में सज ना पाये
क्योँ तेरा छोटी-छोटी बातों पे बेवजह रूठना
फिर चेहरे पे फैली मुस्कराहट से मान जाना हो ना पाया

पर आख़िर क्योँ?

ये सवाल सिर्फ़ एक सवाल बनकर ही रह गए
उस दिन के बाद फिर ना कभी उससे मुलाकात हुई और ना ही कोई बात हुई.

बारिश

खिडकियों पर उतरते पानी के रैलों से काँच पे अजीबो-ग़रीब शकलें बनाना.
चुपके से घर से निकलकर बरसते पानी में धूम मचाना.
भीगना, नाचना, गाना, दोस्तों के साथ उछलना-कूदना और
नालों में पानी के जहाज़ की रेस लगाना.
फिर किसी भी तरह माँ की नज़रों से बचते-बचाते दबे-पांव घर में वापस जाना
और पकड़े जाने पर माँ का फटकार लगाते हुए
सर्दी से तपते माथे पर अपने प्यार का बाम लगाना.
कितना कुछ लेकर आती थी पहले ये बारिश अपने साथ.
डाँट, फटकार, प्यार, दुलार,
दोस्तों का साथ और मस्ती में डूबे हुए से वो पल.
सच कितना अनूठा था वो सब.

बॉम्बे

दिन ढलता नहीं यहाँ,
हर शाम नया सवेरा होता है
होते हैं कई बेफ़िक्रे
जिनकी ज़िंदगी का दूर अंधेरा होता है.

फिर से पकड़ लेता है रफ़्तार ये शहर
जब दूर कोई बखेड़ा होता है.

चलता नहीं यहाँ फिर कोई,
सब साले दौड़ लगाते हैं
कभी नेम तो कभी फेम
के नशे में धुत होकर गश्त खाते हैं
बैठे-बैठे दुनिया के चक्कर लगाते हैं.
बेकिफरे ये साले हर साँस पर दाव लगाते हैं.

नीली-पीली, हरी-गुलाबी रोशनी की यहाँ भरमार है
हर मोड़ पर नीलाम होती ख्वाहिशों का व्यापार है.
मस्ती, चकाचौन्ध और रंगरलियों के हैं ये मारे
बेचारे कितना भी जीते, फिर भी हर पल हैं हारे.

बड़ा अजीब है ये शहर
बॉम्बे – सपनों का शहर.

जन्नत का तो पता नहीं, पर मन्नत यहाँ ज़रूर है
जहाँ लगता हर शाम इन सालों का हुज़ूम है.
देखते हैं सपने बड़े-बड़े, छोटी-छोटी आँखों से
पर नहीं होता कोई लेना देना इनका जज़्बातों से.

रिश्ते भी हैं बड़े बेपरवाह इनके यहाँ
इस घर सोते, तो उस घर हैं उठते.
बड़ा अजीब इस शहर का दस्तूर है,
एक घर में रहते, फिर भी मीलों दूर हैं.

बड़ा अजीब है ये शहर
बॉम्बे – सपनों का शहर.