कुछ ख़याल

हिचकियों ने अब साथ छोड़ दिया है मेरा
लगता है तू आज कल मुझे याद नहीं करता.

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जब हम अमीर थे,
तुम हमारे करीब थे.

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घर की मुंडेर पर आज
एक कोवा नज़र आया
शायद कोई आने वाला है.

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कभी कोशिश ही नहीं की उसने अपने
हाथों की लकीरों को पड़ने की
कुछ लकीरें उसमे मेरे नाम की भी थी.

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अजीब दौलत है तेरे इश्क की
जितना भी ख़र्च करो उतनी ही बढती जाती है.

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तुम्हे ही लिखता हूँ में हर अलफ़ाज़ में
वरना नहीं कुछ मायने मेरे और
मेरे अल्फाज़ों के तुम्हारे बिना.

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लोगो का वक़्त आता है,
मेरा एक पूरा दौर होगा.

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कुछ ख़याल

बड़े दिनों बाद आज आई है उन्हें याद हमारी
वरना हम ही थे जो फ़ुर्सत से उनकी यादों को
दिल से लगाए बैठे रहते थे.

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कहीं ना कहीं कोई तो ऐसा होगा जो
मुझे खोने से डरता होगा.

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चाहे कितने भी आईने रख दो उनके सामने
पर सच्चाई तो उनकी आँखों में ही नज़र आती है.

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कुछ और पल रुका था वो आज मेरे पास
शायद उसे भी मेरा साथ अब अच्छा लगने लगा है.

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दिल से कोशिश की थी मैने उसे मानने की
और उसने कोशिश की थी मेरी
हर कोशिश को आज़माने की.

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शब्द तो बहुत है मेरे शब्दकोश में
पर तुम्हारे दिल तक पहुंच सके ऐसे शब्द कम हैं.

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उलझे रहे ज़िंदगी के सवालों में सारी उम्र
सुलझे भी तो उस एक पल में.

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चलो फिर से मिलकर कुछ सुकून भरे पल  ढूंढते  है
शायद इस बार हमारी कोशिशें काम कर जाएँ.

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बस अब इतनी सी रह गई है ये कहानी
एक था वो और एक थे हम.

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फिर से लौट आया है
वही  जाना-पहचाना दर्द
पल पल बढ़ती बेचैनी
और
हर सुकून भरी नींद के साथ
बढ़ता ख्वाहिशों का बोझ.

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फिर से रहने लगा है मेरे कमरे में वही अँधेरा
जो कभी थोडा तेरा था तो और कभी थोडा मेरा.

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मुलाकाते ट्रेन

एग्जाम ख़तम हुए दो दिन हो चुके थे, मगर एग्ज़ाम का हैंगओवर अभी तक उतरा नहीं था आशीष के सर से, पूरे कमरे में यहाँ वहाँ किताबें, नोट्स और चाय के कप बिखरे हुए थे, कुल मिलाकर एक बैचलर के कमरे का जो हाल होता हैं वैसा ही कुछ हाल उस समय आशीष के कमरे का था. सुबह के ग्यारह बज चुके थे पर आशीष के लिए अभी सुबह नहीं हुई थी, बड़े ही आराम से आशीष अपने बेड, जिस के एक और किताबें और दूसरी और बहुत सारे कपड़े फैले थे, बेफ़िक अपने ख़्वाबों के संसार में खोया था, इस बात से बेख़बर के दोपहर दो बजे जो ट्रेन उसे पकड़नी है वो एक बहुत ही खूबसूरत ख़्वाब की सौगात लेकर आने वाली है. वैसे भी ये उम्र होती ही ऐसी ही, अपने ही ख़्वाबों की दुनिया में खोये रहते हैं हर पल. आशीष भी कुछ ऐसी ही ख़्वाबों की दुनिया में खोया हुआ था पर उसके ख़्वाबों में जल्द ही दखल दे दिया अलार्म क्लॉक की कर्कश ध्वनि ने और ला खड़ा किया उसे असली दुनिया में. अपनी आँखों को मलते-मलते जैसे-तैसे उसने अलार्म क्लॉक को बंद किया और एक हाथ में तोलिया और दुसरे हाथ में टूथब्रश लिए बड चला बाथरूम की तरफ. जल्दी जल्दी ब्रश किया, नहाया और लग गया अपने बेग में कपडे भरने जैसा की वो हमेशा करता था, वो कहते हैं ना ‘लास्ट मिनट पैकिंग’. वैसे कमरे की उस उथल-पुथल में कपडे ढूँढ़ना आशीष के लिए जितना आसान था शायद किसी और के लिए उतना ही मुश्किल होता. और अगले कुछ ही मिनटों में अपना बैग पैक कर वो जा पहुचा ऑटो स्टैंड.

दूर दूर तक कोई ऑटो दिखाई नहीं दे रहा था, ना ही कोई राहगीर और ना ही छोटे बच्चों की टोलियाँ अठखेलियाँ करते. सर को चकरा देने वाले गरम हवा के थपेड़े सायें-सायें चले जा रहे थे.और ऐसी गर्मी में ऑटो ढूँढ़ना ठीक वैसा ही होता हैं जैसे किसी अँधेरे कमरे में सुई ढूँढ़ना. वैसे अक्सर गर्मियों में छोटे शहरों का कुछ ऐसा ही हाल होता हैं, किराना शॉप हो या किसी शोरूम का मालिक या फिर ऑटोवाला दोपहर का भोजन कर सुकून की नींद निकालने घर जाना सबके लिए जैसे एक दिनचर्या होती है. और गर्मियों में सोना तो जैसे वहां की ‘रूल बुक’ का एक एहम रूल है, जिसे तोडा तो भारी फाइन चुकाना पड़ेगा. इसलिए सभी नियमानुसार दोपहर एक से तीन तक कूलर चालू कर सुकून की नींद निकाल लेते हैं. खैर ये सब जाने दीजिये हमारी कहानी आगे बढ़ाते हैं, कुछ मिनट तपती दोपहरी में तपने के बाद आशीष को एक ऑटो नज़र आया और बहुत मनावने और मिन्नत करने के बाद ऑटो वाले भैया तैयार हुए स्टेशन चलने के लिए. वैसे भी ऐसी गर्मी की दोपहरी में ऑटोवाले किसी रियासत के राजकुमार बन जाते हैं क्यूंकि उन्हें पता होता है आस-पास ऑटो मिलने वाला नहीं इसलिए मनचाहा किराया वसूल करो और ऊपर से नखरे दीखाओ सो अलग. ऐसा ही कुछ आशीष के साथ हुआ, किराये से ३० रुपये ज्यादा देकर और लाख मानावने करके वो पहुंचा रेलवे स्टेशन, जहाँ ट्रेन छूटने में सिर्फ़ दो ही मिनट बाकी थे. जल्दी-जल्दी ऑटोवाले को पैसे देकर वो भागा अपनी ट्रेन पकड़ने राजधानी की रफ़्तार से, उस रफ़्तार से अगर ओलंपिक्स में भागने का मौका मिलता तो आशीष भारत के लिए एक गोल्ड मैडल जरूर ले आता.

जैसे-तैसे ट्रेन में चड़ा तो क्या देखता है ट्रेन खचा-खच भरी हुई है. ट्रेन के हालात देखकर तो यही लगा रहा था मानों अधिकतर लोग गर्मी की छुट्टियां मनाने या तो घर जा रहे थे या फिर अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ. कुछ बच्चे इधर से उधर भाग रहे थे उनके पीछे-पीछे उनके पापा और मम्मी भागे जा रहे थे उन्हें सँभालते हुए. कहीं दूर किसी कोने में एक बूढ़े काका मूंगफली छीलते हुए पुराने ज़माने की कहानियां सुनाये जा रहे थे और उनके सामने बैठे अंकल मुहं बनाकर हाँ, हूँ किये जा रहे थे. उनका चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था मानो जैसे उन्हें किसी ने काका की कहानियां सुनने की सजा दी हो. वहीं दूसरी और की सीट पर एक कपल बैठा हुआ था, हल्की-हल्की आवाज़ में शायद इस खचाखच भरी ट्रेन में भी उन्होंने अपने लिए प्यार के कुछ लम्हे जुगाड़ कर लिए थे. किसी कोने से बच्चे के रोने की आवाज़, किसी तरफ से एक माँ के चिल्लाने की कर्कश ध्वनि, एक तरफ मूंगफली बेचता हाफ पेंट पहने एक लड़का, तो दूसरी और माँ से पॉपकॉर्न लेने के लिए ज़िद करता एक बच्चा. कुल मिलाकर एकदम ऐसा माहौल जिसमे कई कहानियां और कई कहानियों के किरदार बख़ूबी अपना किरदार अदा कर रहे थे बिना किसी शिकायत के. उन्ही कहानियों में से एक कहानी थी आशीष की जो ट्रेन की रफ़्तार जितनी तो नहीं पर ज़िन्दगी की पटरियों पर काफी तेज़ भागे जा रही थी और बेचारा आशीष तालमेल बैठाने की कोशिश में जी जान से लगा हुआ था. काफी मेहनत की, कुछ लोगो से जरा इधर उधर सरक कर जगह देने के लिए मनावने भी किये मगर आशीष की सीट पाने की ख्वाहिश सिर्फ एक ख्वाहिश ही रही. और उसने अपने आप को यह कहकर समझा लिया के भाई सीट पाने की मोह-माया से मुक्त हो जाओ और खड़े-खड़े इस सफ़र का आनंद लो. फिर क्या था अपना बेग सुरक्षित एक कोने में रख वो ऐसी जगह जा कर खड़ा हो गया जहाँ से बेग को देखा जा सके. ट्रेन में सफ़र करो तो यही चिंता रहती है की कहीं कोई आपका सामान ना उठा ले जाए. वैसे आशीष के बेग में कोई हीरे-जवाहरात या सोने के बिस्किट नहीं थे सिर्फ़ कुछ कपडे और घरवालों के लिए ख़रीदे हुए गिफ्ट्स. फिर भी भाई देखरेख जरूरी है, नुक्सान आखिर नुक्सान होता है.

ट्रेन अब रफ़्तार पकड़ चुकी थी और आशीष की कहानी भी, इस कहानी में कई किरदार बगैर इजाज़त ख़लल डाले जा रहें थे, जैसे वो भाईसाहब जो आशीष के बाजू में खड़े थे, उन्हें अपने से ज्यादा जो लोग बैठे थे उनकी चिंता हो रही थी, देखो भाई उन्होंने कैसे कपडे पहने हैं, कैसे बैठे हैं, कैसे बातें कर रहे हैं, उनकी बकबक सुनकर आशीष थोडा परेशान हो गया था इसलिए उसने अपना रामबाण इस्तेमाल किया जो अक्सर वो किया करता है. हैडफ़ोनस, लोगों की बकबक से दिलाये मुक्ति और साथ ही मधुर संगीत की गारंटी. हैडफ़ोनस को मोबाइल से कनेक्ट कर आशीष अपने पसंदीदा गाने सुनते-सुनते, ट्रेन की रफ्तार के साथ पीछे छूट रहे पहाड़, वादियाँ, झरने और पेड़-पोधों को देखकर सफ़र का आनंद उठा रहा था. एक योगी की तरह वो ध्यानमग़न हो चुका था मधुर संगीत, हल्की-हल्की बहती हवा और बाहर के सुकून भरे चित्रों में, बीच-बीच में जरूर उसके इस ध्यान को इक्का-दुक्का लोग तोड़ देते थे जैसे वो छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें सुसु ना भी लगी हो पर ट्रेन में इधर से उधर घूमने के लिए बहाना बनाकर अपने माता-पिता को परेशान करना उन्हें अचछा लगता है. एक मोटे अंकल जो बार-बार थूकने के लिए वाशबेसिन की तरफ रुख किये रहते थे, पता नहीं लोग पान मसाला और गुटका क्यूँ खाते हैं. कभी-कभार इन सबके बीच कोई जाना पहचाना चेहरा भी नज़र आ जाता था आशीष को. जैसे की वो ‘गुड्डू’ महाशय जिनसे आशीष की मुलाकात पिछले ५ सालों में एक बार भी नहीं हुई थी, अचानक ना जाने कहाँ से प्रकट हो गए थे. आशीष तो गुड्डू को पहचान ही नहीं पाया था पर गुड्डू ने उसे पहचान लिया था. कुछ ही देर में उसने अपनी पूरी जन्मकथा बयां कर दी कुछ ही शब्दों में, वो कहाँ से आ रहा है, कहाँ जा रहा है, उसकी शादी कब हुई, किस्से हुई, कितने बच्चे हैं, उनके नाम क्या है, उसने नया घर कब ख़रीदा, किस एरिया में ख़रीदा और कितने का ख़रीदा, ये सब जानने में आशीष की कोई रूचि नहीं थी परंतु करता भी क्या मजबूरी है इसीलिए शान्तिपूर्वक उसकी बकबक सुने जा रहा था. कुछ देर बाद जब वो अपनी कथा सुनाकर थक गया तो उसने आशीष को अपने साथ चलने के लिए कहा इस आश्वासन के साथ के वहां बैठने की जुगाड़ हो जायेगी. प्रस्ताव जोखिम भरा था क्यूँकी गुड्डू भाईसाहब की बकबक सुननी पड़ेगी पर करता भी क्या पूरा सफ़र खड़े-खड़े तो कट नहीं सकता था इसलिए आशीष अपना बेग लेकर गुड्डू भाईसाहब के पीछे-पीछे हो लिया. भाईसाहब की सीट पर पुहंच कर क्या देखता है वहां तो पहले से ही भीड़ लगी है तो उसके बैठने के लिए कहाँ से गुड्डू भाईसाहब जगह बनायेंगे. वो भाईसाहब तो आराम से बैठ गए और आशीष फिर से खड़ा ही रह गया. जल्द ही अगला स्टेशन आने वाला था इसलिए आशीष ने फिर से अपनी जगह गेट के पास फिक्स की और वहीं ताज़ी हवा खाते हुए बाहर के चित्रों का आनंद लेने लगा. ट्रेन की रफ़्तार अब कुछ कम होने लगी थी और कुछ ही मिनटों में ट्रेन एक हलके से झटके के साथ रुक गई, आशीष ने बाहर झांक कर देखा तो कोई स्टेशन था, स्टेशन छोटा सा था इसलिए वहां से ज्यादा लोग तो नहीं मगर इक्का दुक्का लोग ही ट्रेन में चडे और उन्ही में से एक थी आशीष की कहानी की नायिका.

कहानी आगे जारी रहेगी…

अभिमन्यु और चक्रव्यूह

युद्धभूमि सूरज की लालिमा से जगमगा रही है, प्रचंड शोर, पृथ्वी से उड़ती धूल, घोड़ों के टापुओं के तीव्र स्वर और धनुष की टंकार गूँज रही है युद्धभूमि में. एक तरफ जहाँ महासागर जैसा विशाल सैनिक दल, जिसका नेत्रत्व गुरुओं में सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रौण कर रहे हैं, जिनके साथ देने अनेक महायोद्धा जिनमे हैं सुर्यपुत्र कर्ण, दुशासन, दुर्योधन, अश्वत्थामा, मद्रनरेश, कुलगुरु और शकुनी तत्पर हैं. वही दूसरी और पांडव, श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में बड़ी से बड़ी विपत्ति से लड़ने में सक्षम युद्ध के शंखनाद की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

आज सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रौण ने चक्रव्यूह की रचना विशेष रूप से युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध को आज ही समाप्त करने के उद्देश्य से की है, परंतु इसमे सबसे बड़ी बाधा है धनुर्धारी अर्जुन, जो इस चक्रव्यूह को तहस-नहस करना भलीभाती जानता है. पर शकुनी और दुर्योधन ने अपनी कुटिलनीती से पहले ही अर्जुन को युद्धभूमि से कोसो दूर दूसरे प्रायोजन से भेजने का प्रबन्ध किया हुआ है ताकि उन्हे युधिष्ठिर को बँधी बनाने में किसी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े. शंखनाद से युद्ध की घोषणा होते ही जैसे पांडव पक्ष किसी दुविधा में फस गये, उन्हे इस समस्या का कोई उपाय सूझ ही नहीं रहा था, तभी उनकी इस चिंता का उपाय बनकर अभिमन्यु सामने आता है.

अभिमन्यु: ज्येष्ठ पिताश्री मुझे आज्ञा दीजिए मुझे चक्रव्यूह के अंदर प्रवेश करने का मार्ग ज्ञात हैं, मैने श्री कृष्ण से सुना था.

युधिष्ठिर: नहीं अभिमन्यु, में तुम्हे चक्रव्यूह में प्रवेश की आज्ञा नहीं दे सकता. ये अनुचित होगा.

अभिमन्यु: अनुचित तो तब होगा ज्येष्ठ पिताश्री, जब हम गुरु द्रौण की चुनौती का उत्तर नहीं देंगे.

युधिष्ठिर: नहीं में तुम्हे आज्ञा नहीं दे सकता, तुम्हारी सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है.

अभिमन्यु: मुझे भला आप सभी के होते क्या हो सकता है, पिताश्री.

युधिष्ठिर: नहीं अभिमन्यु फिर भी में तुम्हे चक्व्यूह में प्रवेश की आज्ञा नहीं दे सकता.

अभिमन्यु: परन्तु क्यूँ पिताश्री, क्या आपको मेरे युद्ध कौशल पर भरोसा नहीं. क्या आपको लगता है में कौरव सेना का सामना नहीं कर सकता. अपने शब्दों के लिए क्षमा चाहता हूँ पिताश्री, पर आप शायद भूल रहे हैं में श्री कृष्ण का शिष्य और महान धनुर्धारी अर्जुन का पुत्र हूँ. मुझमें भी असीम सहास और वीरता का संचार करता पांडव वंश का रक्त बह रहा है.

युधिष्ठिर: पुत्र मुझे तुम्हारी वीरता और सहास पर तनिक भी संदेह नहीं परन्तु.

अभिमन्यु: परन्तु क्या पिताश्री.

युधिष्ठिर: परन्तु, विपक्षी पक्ष में गुरु द्रौण, कर्ण और दुर्योधन जैसे महान योध्या है, जिनका सामना करने से स्वयं देवता भी डरते हैं.

अभिमन्यु: पिताश्री, ये सभी योध्या गत दिवस मेरे तीखे बाणों का स्वाद चख चुके हैं और मुझे पूर्ण विश्वास है में इन्हें आज भी अपने तीखे बाणों से परास्त कर सकता हूँ. और आप सभी भी तो होंगे मेरे साथ तो भयभीत होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं.

युधिष्ठिर: परंतु अभिमन्यु तुम्हे सिर्फ़ प्रवेश का मार्ग ज्ञात है और इस परिस्थिति में तुम्हारा चक्व्यूह में प्रवेश करना जोखिम भरा हो सकता है और अगर तुम्हे कुछ हो गया तो में अर्जुन को क्या जवाब दूंगा.

अभिमन्यु: उचित कहा पिताश्री मुझे सिर्फ प्रवेश का मार्ग ज्ञात है परन्तु पिताश्री आप शायद मेरी चिंता में इस बात को भूल गए की जिसके साथ गदाधारी भीम जिनकी गदा एक ही वार में बड़े से बड़े वीर को वीरगति दे देती है, नकुल और सहदेव जिनकी तलवारबाजी से स्वयं देवता भी डरते हैं और स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर जिनका भाला बड़े से बड़े शूरवीर को एक वार में मृत्यु के घाट उतर सकता है, उनके रहते मेरे साथ कैसे कोई अनहोनी हो सकती है.

युधिष्ठिर: परन्तु अभिमन्यु

अभिमन्यु: किन्तु, परन्तु जैसे शब्दों का इस युध्भूमि में कोई स्थान ही नहीं पिताश्री, अब कृप्या मुझे आज्ञा दीजिये चक्व्यूह में प्रवेश ही.

युधिष्ठिर: विजयीभवा: तुम आगे चलो हम तुम्हारे पीछे ही हैं.

अभिमन्यु: जी पिताश्री

युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर अभिमन्यु चक्रव्युह की पहली, दूसरी और आगे कई पंक्तियों को तोड़ता चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया.

नोट: यह वार्तालाप महाभारत से जुडी कहानियों से प्रेरणा लेता है, इसमें सभी समीकरणों को जोड़कर एक वार्तालाप के रूप में पेश करने की कोशिश की गई है. इस वार्तालाप का उदेश्य किसी वर्ग, संप्रदाय, राजनितिक दल, समाज के किसी भी वर्ग और व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ढेस पहुंचाना बिल्कुल भी नहीं है.

ज़िन्दगी को तू चेस कर ले

जितना चाहे सूरज को तक ले
खाली पड़ी जेबों को उम्मीद की दौलत से भर ले
थोडा सही वक़्त का वेट तू करले

ज़िन्दगी को तू चेस कर ले
ज़िन्दगी को तू चेस कर ले…

आँखों में ख़्वाबों का सुरमा लगा ले
होटों पे जीत का गीत सजा ले

ज़िन्दगी को तू चेस कर ले
ज़िन्दगी को तू चेस कर ले…

थोडा सा इरादों को टाइट करले
रेनबो को रंगीली शीशियों में भरले

ज़िन्दगी को तू चेस कर ले
ज़िन्दगी को तू चेस कर ले…

नींद

कुछ दिन हुए
नींद ग़ायब सी हो गई है इन आँखों से
ठीक ठीक वजह तो पता नहीं शायद
तेरे इंतज़ार में रात भर जागी रहती हैं ये आजकल.

हिचकियाँ

कुछ दिन हुए
हिचकियों ने फिर से सताना शुरू किया है मुझे
लगता है मेरी यादों पे जो वक़्त की धुल जम गई थी
जाने अनजाने या फिर किसी बहाने साफ़ कर दी है तुमने.

दिल

कुछ दिन हुए
इस दिल ने फिर से सवाल करना सीख लिया है
फिर से धड़कना सीख लिया है
कुछ कहने भी लगा है
ख़ुदा जाने क्या पूछता है, क्या कहता है
किसके लिए धड़कता है
मगर जो भी है
हर बार एक सुकू जरूर मिलता है.

 

तेरा दिल

खोया, खोया
तनहा, तनहा
गुमसुम, गुमसुम
हर पल, हर घडी
अब ये रहने लगा है…
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

थोडा कुछ ये कहता है, थोडा कुछ में सुनता हूँ
अजनबी, अनजाना मीठा सा एक दर्द
अब इस दिल में रिसने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

कुछ अधूरी-अनकही सी कहानियाँ
फिर से बनने लगी है
ठंडी-ठंडी सर्द हवाएं फिर से चलने लगी है.
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

खोया, खोया
तनहा, तनहा
गुमसुम, गुमसुम
हर पल, हर घडी
अब ये रहने लगा है…
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है