तेरा दिल

खोया, खोया
तनहा, तनहा
गुमसुम, गुमसुम
हर पल, हर घडी
अब ये रहने लगा है…
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

थोडा कुछ ये कहता है, थोडा कुछ में सुनता हूँ
अजनबी, अनजाना मीठा सा एक दर्द
अब इस दिल में रिसने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

कुछ अधूरी-अनकही सी कहानियाँ
फिर से बनने लगी है
ठंडी-ठंडी सर्द हवाएं फिर से चलने लगी है.
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

खोया, खोया
तनहा, तनहा
गुमसुम, गुमसुम
हर पल, हर घडी
अब ये रहने लगा है…
तेरा दिल अब मेरे दिल में रहने लगा है

वक़्त

अगर यह वक़्त कभी ठहरा कहीं
तो पूछुगा में उससे
क्यूँ हर दम भागता रहता है तू
क्या कहीं पहुचने की जल्दी है तुझे.

दिल

चार दीवारे खड़ी कर ली हैं उसने अपने दिल के आसपास
लगता है डरने लगा है इस डर से के कहीं फिर से कोई अजनबी घर ना बना ले वहां.

फुर्सत

वक़्त से उधार मांग लाया हूँ कुछ चुनिन्दा लम्हे हमारे लिए
थोड़ी फुर्सत निकाल लेना, हो सके तो कुछ लम्हे साथ जी लेंगे.

 

आँखें

दोस्तों कर रहा हूँ नीलाम यह आँखें
ख़रीदो क्या?

इन आँखों ने देखी हैं
कई सदियाँ और सदियों से जुडी कहानियाँ

इन आँखों ने देखी है
अलिफ़ और लैला की जवानियाँ
कई विक्रम और बैताल की सीख देती कहानियाँ.

इन आँखों ने देखी है
गुलज़ार के नगमो से सजी
मोगली और माँ की गोदी में छुपे गोपाल की नटखट शैतानियाँ

इन आँखों ने देखी है
बॉर्डर पे खड़े सिपाही भाइयों
की देश पे न्योछावर जवानियाँ

इन आँखों ने और भी
बहुत कुछ देखा है
और जो नहीं देखा
देख लेंगी तुम्हारे साथ.

कुछ बातें

कुछ ज़ज्बात बचा लिए थे मैंने
हमारी पिछली मुलाक़ात से
शायद इसी उम्मीद में के अगली मुलाक़ात में बयां कर दूंगा
हाले-दिल पर वो मुमकिन हो ना सका.

क्योँ कदम दो कदम साथ चलने की ख्वाहिश
ख्वाहिश ही रह गई
क्योँ बरसों से प्यासी दिल ही इस जमीं पर
तेरे प्यार की कुछ बूंदें गिर ना पाई
क्योँ तेरी पलकों पे अंगड़ाइयाँ लेते हज़ारों ख्व़ाब
इन आँखों में सज ना पाये
क्योँ तेरा छोटी-छोटी बातों पे बेवजह रूठना
फिर चेहरे पे फैली मुस्कराहट से मान जाना हो ना पाया

पर आख़िर क्योँ?

ये सवाल सिर्फ़ एक सवाल बनकर ही रह गए
उस दिन के बाद फिर ना कभी उससे मुलाकात हुई और ना ही कोई बात हुई.

बारिश

खिडकियों पर उतरते पानी के रैलों से काँच पे अजीबो-ग़रीब शकलें बनाना.
चुपके से घर से निकलकर बरसते पानी में धूम मचाना.
भीगना, नाचना, गाना, दोस्तों के साथ उछलना-कूदना और
नालों में पानी के जहाज़ की रेस लगाना.
फिर किसी भी तरह माँ की नज़रों से बचते-बचाते दबे-पांव घर में वापस जाना
और पकड़े जाने पर माँ का फटकार लगाते हुए
सर्दी से तपते माथे पर अपने प्यार का बाम लगाना.
कितना कुछ लेकर आती थी पहले ये बारिश अपने साथ.
डाँट, फटकार, प्यार, दुलार,
दोस्तों का साथ और मस्ती में डूबे हुए से वो पल.
सच कितना अनूठा था वो सब.

बॉम्बे

दिन ढलता नहीं यहाँ,
हर शाम नया सवेरा होता है
होते हैं कई बेफ़िक्रे
जिनकी ज़िंदगी का दूर अंधेरा होता है.

फिर से पकड़ लेता है रफ़्तार ये शहर
जब दूर कोई बखेड़ा होता है.

चलता नहीं यहाँ फिर कोई,
सब साले दौड़ लगाते हैं
कभी नेम तो कभी फेम
के नशे में धुत होकर गश्त खाते हैं
बैठे-बैठे दुनिया के चक्कर लगाते हैं.
बेकिफरे ये साले हर साँस पर दाव लगाते हैं.

नीली-पीली, हरी-गुलाबी रोशनी की यहाँ भरमार है
हर मोड़ पर नीलाम होती ख्वाहिशों का व्यापार है.
मस्ती, चकाचौन्ध और रंगरलियों के हैं ये मारे
बेचारे कितना भी जीते, फिर भी हर पल हैं हारे.

बड़ा अजीब है ये शहर
बॉम्बे – सपनों का शहर.

जन्नत का तो पता नहीं, पर मन्नत यहाँ ज़रूर है
जहाँ लगता हर शाम इन सालों का हुज़ूम है.
देखते हैं सपने बड़े-बड़े, छोटी-छोटी आँखों से
पर नहीं होता कोई लेना देना इनका जज़्बातों से.

रिश्ते भी हैं बड़े बेपरवाह इनके यहाँ
इस घर सोते, तो उस घर हैं उठते.
बड़ा अजीब इस शहर का दस्तूर है,
एक घर में रहते, फिर भी मीलों दूर हैं.

बड़ा अजीब है ये शहर
बॉम्बे – सपनों का शहर.

ब्रेकअप के बाद – आख़री मुलाक़ात.

ज़िन्दगी एक सफ़र है और हम सब एक मुसाफ़िर, कब कहाँ किस मोड़ पर किस रूप में हमें ख़ुद से ही मिला देती है पता नहीं. ऐसा ही कुछ हुआ निशांत के साथ, रिया से ब्रेकअप को तकरीबन १४ साल से अधिक हो चुके थे, यह १४ साल किसी वनवास से कम नहीं थे. रिया के जाने के बाद जैसे निशांत की ज़िन्दगी पूरी तरह बदल चुकी थी ना ज्यादा किसी से मिलना, ना बातचीत, बस अपने काम में लगे रहना और घर आकर टीवी और इन्टरनेट की दुनिया में खो जाना. उस दिन निशांत कुछ ज्यादा ही जल्दी उठ गया था अपने नियमित समय से पहले, सुबह ९:३० की ट्रेन जो पकडनी थी दिल्ली के लिए. वैसे तो निशांत को ट्रेन का सफ़र बिलकुल पसंद नहीं था मगर क्या करे अचानक से प्लान बना और हवाई जहाज के टिकट भी न मिल पाए, तो मजबूरी में ट्रेन का रिजर्वेशन ही करवाना पड़ा.

निशांत के फ्लैट से रेलवे स्टेशन का रास्ता कुछ ५० मिनट का है मगर आज ट्रैफिक ना होने के कारण यह दुरी उसने कुछ ३५ मिनट में ही तय कर ली थी और किस्मत देखिये उस दिन ट्रेन तकरीबन १ घंटा देरी से चल रही थी. निशांत इस बात से बुरी तरह झुंझला उठा था वैसे भी उसे ट्रेन का सफ़र पसंद नहीं था और ऊपर से ट्रेन १ घंटा लेट. रेल्वे पर गुस्सा उतरना चाह रहा था पर क्या करे मजबूर होकर पास के एक बुक स्टाल पर जाकर टाइम पास करने लगा. निशांत को पड़ने का वैसे कोई खासा शौक नहीं था फिर भी आदतन जब भी कोई नयी पुस्तक या नावेल दिखता अपने आप को ख़रीदने से नहीं रोक पाता. आज भी आदतन दो-तीन पुस्तकें इस आशा के साथ ख़रीद ली की ट्रेन में समय काटने का काम तो हो ही जायेगा. पैसे चुकाकर वो नजदीकी एक बेंच पर जाकर एक पुस्तक में खोने की जी जान से कोशिश कर ही रहा था की अचानक उसकी नज़र पास की ही बेंच पर बैठी एक महिला पर पड़ी. काले घने बाल, रंग सावला, कद कुछ ५ फीट २ इंच. बड़ी ही आकर्षक गुलाबी रंग की साडी पहने हुए थी. जिस पर बड़ी ही कलाकारी से जरदोजी का वर्क किया हुआ था. महिला अपना सर दूसरी और किये हुए बैठी थी, इसलिए चेहरा साफ़ नज़र नहीं आ रहा था, फिर भी जाने क्यूँ निशांत को ऐसा लगा जैसे वो उसे जानता है. और अपनी इसी उत्सुकता के चलते वो धीरे क़दमों से उस और बढता है और थोडा करीब पहुंचता है तो क्या देखता है वो जानी पहचानी महिला कोई और नहीं रिया है. इतने सालों बाद रिया को देखकर उसे ऐसा लगा मानों जैसे कोई उसे वापस १४ साल पीछे ले गया हो, पिछली सभी यादें उसके मस्तिष्क में तैरने लगती हैं. खुद को जैसे संभालकर, साँसों को लगाम देता, वो बहुत ही दबे शब्दों में उसका नाम पुकारता है.

हेलो रिया

वो कभी भी उसे पलटकर देख सकती है, साक्षात् होने के ख़याल से ही उन चंद लम्हों में एक तूफ़ान निशांत के मन में आया और सब कुछ तहस नहस करके चला गया. और दबे शब्दों की आवाज़ सुनकर जब वो पलटकर देखती है तो वही चेहरा उसके सामने था, बड़ी नीली आँखें, मासूम चेहरा और चेहरे से छेड़खानी करते कुछ बाल.

निशांत को अचानक यूँ देखकर, रिया थोडा अचंभित है पर अपने आपको संभालकर वो बोलती है.

रिया: हेलो निशांत, तुम यहाँ कैसे.

निशांत थोड़े मजाकिया अंदाज़ में बोलता है: कुछ नहीं बस तुम्हारा पीछा कर रहा हूँ.

रिया: तुम अभी तक बदले नहीं, वही मज़ाक.

निशांत: पर तुम बहुत बदल गई हो, काले घने बाल, खूबसूरत साड़ी और कुछ नई मगर वही पुरानी प्यारी सी मुस्कान.

रिया: स्टॉप फ्लिर्टिंग विथ मी, और ये बताओ कैसे हो और यहाँ कैसे.

निशांत एक ही सांस में कई सारे सवाल रिया के सामने रख देता है:

में ठीक हूँ, बस दिल्ली जा रहा था और तुम कैसी हो और कहीं जा रही हो या फिर कहीं से आ रही हो.

रिया: जरा सांस तो लो निशांत, इतने सारे सवाल एक साथ.

निशांत: चलो ठीक है एक एक करके जवाब दो.

रिया: में बिलकुल ठीक हूँ, जैसा के तुम देख सकते हो. और यहाँ दो दिन पहले ही आयी थी एक फ्रेंड ही शादी में और अब वापस जा रही हूँ.

निशांत: और भी बहुत कुछ पूछना है पर समझ ही नहीं आ रहा कैसे पूछूँ और कहाँ से पूछूँ.

रिया: तो ठीक है तुम बोलो कहाँ से शुरू करूँ.

निशांत: हमारे ब्रेकअप के बाद से.

रिया: हमारे ब्रेक-उप के कुछ दिनों बाद मैंने मुंबई शिफ्ट कर दिया था, फिर वहीँ पर विशाल से मुलाक़ात हुई, २ साल डेटिंग, फिर शादी… कुछ सालों तक तो सब कुछ ठीक था, मगर जैसे जैसे समय बीतता गया उसके साथ हमारा रिश्ता भी. छोटी छोटी नोक झोक बड़े-बड़े झगड़ों में कब बदल गई पता ही नहीं चला और फिर जब बात बहुत ज्यादा बिगड़ गई तो सारी प्रोब्लेम्स का फाइनल सलूशन डाइवोर्स. और उसके बाद कभी फिर हिम्मत ही नहीं हुई किसी रिश्ते में बंधने की.

रिया की आवाज़ में थोडा सा दर्द साफ़ झलक रहा है, उसका गला भर आया है, मगर वो अपने आप को सम्हालते हुए निशांत से पूछती है.

रिया: मेरा छोड़ो तुम अपनी बताओ, बीबी कैसी है और बच्चे.

निशांत थोड़ी देर चुप रहा अपने ही ख़यालों में खोया हुआ. रिया के दोबारा पूछने पर ही उसने जवाब दिया.

निशांत: मैंने शादी नहीं की.

रिया: क्यूँ?

निशांत: ऐसे पूछ रही हो, जैसे तुम्हे पता नहीं.

एक बार फिर एक अजीब सी ख़ामोशी दोनों के बीच किसी कोहरे की तरह फ़ैल जाती है. रिया के चेहरे को देखकर साफ़ पता चलता है वो कितनी दुखी हुई है इस बात को सुनकर, मगर अब कर भी क्या सकती है, रिश्ता तो वो आज से १४ साल पहले ही तोड़ चुकी थी. और फिर इसके बाद जब कभी निशांत का फ़ोन आता तो वो हमेशा कोई ना कोई बहाना ढूंड ही लेती थी उससे बात ना करने का. और आज इतने सालों बाद जब मिले हैं, तो इन परिस्थितियों में. ये सब सोचकर उसकी आँखों में थोड़ी सी नमी आ गई जिसे वो निशांत के छुपाने में नाकामयाब रही. निशांत रिया के चेहरे से उसके दिल का हाल समझ गया था, इसलिए उसने अपने बैग से निकालकर पानी उसकी और बढाया.

रिया ने बिना कुछ बोले, निशांत के हाथ से पानी ही बोतल ली और दो घूंट पानी पीकर बोली.

रिया: आखिर तुमने शादी क्यूँ नहीं की.

निशांत थोडा सोचने के बाद बोलता है.

निशांत: पता है तुम्हे उस दिन तुम्हारे जाने के बाद में बहुत देर तक वही बैठा रहा और यही सोचता रहा, आखिर ऐसा क्या गलत हुआ था हमारे रिश्ते में की तुमने एक बार भी नहीं सोचा मुझे छोड़ने से पहले. आखिर क्या वजह रही होगी उस बेरुखी की. आखिर क्या मजबूरी थी के ये दिल जो मुझे इतना चाहता था उसने मुझे एक पल में पराया कर दिया. जब इन सब सवालों के जवाब नहीं मिले तो फिर किसी से रिश्ता जोड़ने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई.

रिया चुपचाप निशांत की बातें सुन रही थी, उसे कहीं ना कहीं यह महसूस हो रहा था, अगर उसने उस दिन इतनी जल्दबाजी ना दिखाई होती तो आज हालात कुछ और होते. वैसे उस रिश्ते को निशांत ने हमेशा ही सभी चीज़ों से बढकर माना था, हमेशा उसे खुश रखने को कोशिश करता था, कितना भी बिजी क्यूँ ना हो पर फिर भी कैसे ना कैसे उसके लिए वक़्त निकाल ही लेता था. ऐसी और कई बातें रिया के जहन में घूम रही थी.

रिया को इस तरह ख्यालों में खोया और चेहरे पर अनेकों प्रकार की लकीरों को उभरता देख निशांत रिया के दिल का हाल समझ गया, माहौल को थोडा लाइट करने के लिए मजाकिया अंदाज़ में बोला.

निशांत: अरे यार हम भी क्या ये पुरानी बातें लेकर बैठ गए, चलो बताओ क्या खाओगे. मेरे तो पेट में चूहे कबड्डी खेल रहे हैं, ट्रेन पकड़ने की जल्दी में कुछ खाया ही नहीं. बोलो क्या खिला रही हो.

रिया अब भी चुप है निशांत के बार-बार पूछने पर भी कुछ जवाब नहीं दे रही है, उसकी आँखों से सिर्फ आंसू बहते चले जा रहे है. ऐसा लग रहा है मानो इतने सालों से सिर्फ इसी इंतज़ार में थे ये आँसू जो आज बह निकले हैं और कह रहे हैं हाले-दिल.

रिया: निशांत प्लीज मुझे माफ़ करदो, सब मेरी ही गलती थी, में ही नासमझ थी, तुमने तो पूरी कोशिश की थी हमारे रिश्ते को बचाने की मगर मैंने ही जल्दबाज़ी की और सब खराब कर दिया.

आंसू रिया की आँखों से बहते ही चले जा रहे थे, निशांत के बहुत कोशिश की मगर रिया रोये चले जा रही थी. जब रिया को चुप करने की उसकी सारी कोशिश नाकामयाब हो जाती हैं तो वो कुछ बोलता है.

निशांत: अगर एक और मौका मिले गलती को सुधारने का.

यह सुनकर रिया जैसे बर्फ की तरह जम गई, बस नज़र भरकर निशांत को देखती रही. पता नहीं क्यूँ वो हमेशा से ही इस सवाल से बचना चाहती थी मगर फिर भी आज ये सवाल उसके सामने खड़ा था. उसके पास कोई जवाब नहीं था बस वैसे ही बैठे हुई थी वो निशांत को देखते हुए.

निशांत के कई बार पुकारने के बाद रिया ने सिर्फ अपना सर हिला दिया, उसे ऐसा लगा जैसे उसे किसी ने गहरी नींद से जगा दिया हो.

निशांत: तो फिर क्या जवाब है तुम्हारा.

रिया: देखो निशांत तुम बहुत एक बहुत अचछे इंसान हो, जो दिल में होता है वही तुम्हारे चेहरे पर. और उससे भी बढकर एक और है, तुम दूसरों की फीलिंग्स को समझते हो उनकी क़द्र करते हो. तुम्हारे जैसे इंसान बड़ी मुश्किल से मिलते हैं. तुम जिसे चाहो उसे खुश रख सकते हो, तुम जिस भी लड़की को चुनोगे वो लकी होगी. तुम एक बार मेरे कारण अपनी ज़िन्दगी के १४ साल बर्बाद कर चुके हो और अब में यह नहीं चाहती में फिर से तुम्हारी ज़िन्दगी में किसी तरह की रुकावट बनूँ.

तुम्हे पता है, यहाँ से जाने के बाद में हमेशा यही प्राथना करती थी की तुमसे फिर कभी मुलाक़ात ना हो, क्यूंकि में जानती थी की तुम अपने आप को रोक नहीं पायोगे और में फिर से तुम्हारा दिल नहीं तोडना चाहती थी. जो कुछ था हमारे बीच वो पहले ही ख़तम हो गया था, प्लीज अपनी ज़िन्दगी तबाह मत करो, भूल जाओ मुझे.

यह सब सुनकर निशांत जैसे फिर से अपने आपको उसी रेस्टोरेंट के कोने में खड़ा पाता है जहाँ आज से १४ साल पहले रिया से उसकी आख़री मुलाक़ात हुई थी. फिर से वही सब हो रहा था, जो आज से १४ साल पहले हुआ था. फिर से एक बार रिया ने उसे ज़िन्दगी के दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया था, जहाँ से एक रास्ता एक नयी ज़िंदगी की और लेकर जाता है जहाँ कई रंग हैं और दूसरा वही पुरानी लाइफ जिसमे सिर्फ वो है और कुछ फीके पड़े हुए यादों के रंग. एक बार फिर से उसे फैसला करना होगा, एक ऐसा फैसला जो उसकी आने वाली ज़िन्दगी तय करेगा.

और इस बार उसने वही किया जो उसे आज से १४ साल पहले करना चाहिये था, बड गया अपनी ज़िंदगी में आगे क्यूंकि ज़िंदगी का नाम आगे बड़ते रहना है और चलते रहना है. वो अपने ही ख्यालों में खोया हुआ था, अभी ट्रेन का हॉर्न उसके ख़यालों में अंतराल देने में कामयाब रहा, दिल्ली जाने वाली ट्रेन प्लेटफार्म नंबर १ पर लग चुकी थी और उसका हॉर्न उसे चीख़-चीख़ कर बुला रहा था. निशांत अपना बैग और बुक्स उठा धीरे-धीरे क़दमों से अपने कम्पार्टमेंट की तरफ बड रहा है. एक अजीब ही सी शान्ति और सुकून है उसके चेहरे पर जैसे बहुत कुछ बदल गया हो उसके अन्दर.

रिया वहीं बैठी निशांत को ऐसे ही नज़र भर कर देखे जा रही है उसने उसे रोकने की कोशिश नहीं की और ना ही कुछ बोलने की. बस एक टक देखे जा रही थी. निशांत कम्पार्टमेंट तक पहुंच कर थोड़ी देर वही रुकता है. पलटकर देखता है तो रिया उसे वैसे ही एक टक देखे जा रही थी. निशांत ने भी उसे नज़र भर देखा और चढ़ गया डिब्बे में और निकल पड़ा एक नए सफ़र पर. आज उसका १४ सालों का वनवास ख़तम हुआ था दोनों के मिलन के साथ नहीं फिर से अलग होने पर.

समाप्त.