आसमानों को छूने का दम रखते हैं…

आसमानों को छूने का दम रखते हैं
बहुत संभल कर हम अपने कदम रखते हैं

ज़रूर कुछ पलों को ठहर जाते हैं
जब सख्त रास्तों पर निरंतर चलकर थक जाते हैं.

होसला कम फिर भी नहीं होता है
जब कभी मुसीबतों के बादल घिर आते हैं.

आसमानों में उड़ते रहते हैं आवारों से अठखेलियाँ करते
जब कभी अपने मन की करने पर आते हैं.

फिर ज़मीन पर गिर जाने की परवाह नहीं करते हैं
जब एक बार उड़ने निकल जाते हैं

उस घर में…

उस घर में
स्याह अँधेरा है
और तन्हाई का बसेरा है

दो भटकते हुए साए हैं
और एक गुमनाम बसेरा है.

एक ख़ामोश दबी सी चीख है
और ज़िन्दगी पर बढता पहरा है

एक बुझती हुई उम्मीद भी है
और मीलों दूर कहीं होता सवेरा है.

भर ले तू ऊँची उड़ान

नहीं ख़्वाबों पर कोई बंदिश,
न वक़्त के साथ कोई बदती रंजिश
दे होसलों को नई पहचान,
भर ले तू ऊँची उड़ान.

कुछ नए ख्वाब इन आँखों में बसा ले,
जरा उम्मीदों वाला सुरमा लगा ले
कसकर ज़िंदगी की कमान
भर ले तू ऊँची उड़ान.
भर ले तू ऊँची उड़ान.

आकाश है खुला पड़ा,
समंदर तेरे क़दमों में पड़ा
पक्के इरादों से हासिल कर नए मुकाम
भर ले तू ऊँची उड़ान.
भर ले तू ऊँची उड़ान.

अरमानों के तीर से सीना
तू पत्थरों का चीर दे
भुलाकर सारे झूठे अभिमान
भर ले तू ऊँची उड़ान.
भर ले तू ऊँची उड़ान.

मिट्टी के सपने

सुबह के तकरीबन ६ बज रहे थे. मौसम में थोड़ी नमी थी और हवा भी हलके हलके बह रही थी. गाँव की एक छोटी सी झोपडी के एक कोने में मिट्टी के बिछोने पर शुभा दुनिया से बेख़बर मिट्टी के सपनों में खोई हुई थी. शुभा कहने को तो सिर्फ़ १३ साल की है मगर बातों और समझदारी में किसी बड़ी उम्रवालों से कम नहीं है. रंगबिरंगे सपने देखना और उन सपनों के लिए जी तोड़ मेहनत करना, सिर्फ़ यही सीखा है उसने. अपनी मेहनत और सच्ची लगन की बदौलत ही उसने पिछले साल १० कक्षा के बोर्ड एग्जाम में पूरे जिले में टॉप किया था. इतना ही नहीं उसकी इस उपलब्धि पर कलेक्टर द्वारा उसे वार्षिक उत्सव के दौरान सम्मानित भी किया गया था. शुभा आज भी रंगबिरंगे सपनों में खोई हुई है तभी उसके रंगबिरंगे सपनों में एक ख़राश भरी आवाज़ खलल पैदा कर देती है. भीखू कुम्हार शुभा के पिता, बड़े ही प्यार से शुभा को उठाने की कोशिश कर रहे हैं.

उठ जा बेटा, आज बहुत सारे खिलोने बनाने हैं.

भीखू कुम्हार का एक छोटा सा परिवार है. कुल मिलाकर 4 सदस्य हैं परिवार में, भीखू, उसकी पत्नी, शुभा और उसकी बुडी माँ. भीखू कुम्हार मिट्टी के खिलोनें, मटके और दिये वगेरह बनाकर अपना पूरा परिवार पालता है. पर पिछले कुछ सालों में प्लास्टिक के खिलोनें और चीनी मिट्टी के दीयों का प्रचलन बड़ने से भीखू कुम्हार का व्यापार कुछ थम सा गया है. जहाँ वो महीनेभर में ८-१० हज़ार के खिलोनें, दिये और मटके बेच दिया करते थे, वो अब गिरकर सिर्फ़ ३ हज़ार रूपए रह गए हैं और इतने कम रुपये में पूरे घर का ख़र्च चलाना बहुत मुश्किल हो चला है और कुछ दिनों से माँ की तबियत भी बिगड़ने लगी थी. और रही सही कसर गाँव के सबसे बड़े साहूकार ने गाँव में खिलोनों की दूकान खोलकर पूरी कर दी थी, जहाँ कई तरह के खिलोनें थे जैसे चाबी घुमाने पर करतब दिखाता बन्दर, उड़ने वाला प्लेन, सरपट दौडती कार और ना जाने क्या-क्या. ऐसे में भीखू कुम्हार के खिलोनें कौन ख़रीदता, अब तो जो इनकम ३ हज़ार थी, वो भी आधी रह गई थी. फिर भी भीखू कुम्हार ने हार नहीं मानी थी, वो आज भी उसी लगन से खिलोनें बनाता और सारे गाँव में घूम-घूमकर खिलोनें बेचने की कोशिश करता. और उसकी हर कोशिश में उसके साथ होती शुभा, उसकी नन्ही परी.

शुभा आज भी हमेशा की तरह उठकर खिलोनें बनाने में भीखू की मदद करती है, फिर खिलोनों पर रंग लगाती है, उन्हें सूखने के लिए एक कोने में रख देती और फिर सूखे खिलोंनों और दीयों को अलग रखकर बेचने के लिए तैयार कर देती. इस बीच दोनों बाप-बेटी बहुत मस्ती करते, हंसी के ठहाके पूरे आंगन में गूंज जाते, मगर आज उसके पिता जो हमेशा उसके साथ हस्ते और खेलते थे आज बहुत देर से चुप थे और उसकी इस चुप्पी को बहुत देर से पड़ रही थी शुभा. उसे इस चुप्पी और ख़ामोशी का मतलब शायद समझ आ गया था, इसीलिए वो अपने बाबा का थोडा ध्यान बाटने की कोशिश करती है.

देखो बाबा, मैंने रंग कर दिया है इन खिलोनों पर. देखो ये राजकुमारी कैसी लग रही है.

भीखू बड़े ही प्यार से शुभा की तरफ देखकर बोलता है.

सुन्दर, बिल्कुल मेरी नन्ही परी जैसी.

इतना बोलकर भीखू फिर से चक्के के पास बैठ फिर से गहरी सोच में खो जाता है.

शुभा जो बहुत देर से अपने पिता का ध्यान बाटने की कोशिश कर रही थी, अपनी कोशिशों को नाकामयाब होते देख थोड़ी मायूस ज़रूर होती है मगर उसे पता है अपने पिता को हँसाने के लिए क्या करना है.

शुभा चुपके से भीखू के पास जाती है और गुदगुदी करती है, इस तरह अचानक से शुभा के गुदगुदी करने से भीखू हसने लगता है और साथ में शुभा भी खिलखिला कर हसने लगती है. भीखू अपनी नन्ही सी परी शुभा को गले लगा लेता है. थोड़ी देर बाद दोनों तैयार खिलोनों को टोकरी में रखते हैं और भीखू टोकरी लेकर गाँव में बेचने के लिए निकल जाता है और शुभा स्कूल जाने के लिए तेयारी करने लगती है.

दिनभर भीखू कड़ी धूप में घर-घर जाकर खिलोनें बेचने की फिर से एक नाकामयाब कोशिश करता है और जब कुछ ज्यादा खिलोने नहीं बिकते तो थकहारकर तकरीबन ४ बजे घर वापस आ जाता है. रोज की तरह भीखू कुछ वक़्त अपने बूढ़े माता-पिता के पास बैठता है और फिर अपनी पत्नी के साथ खाना खाकर आराम करने चला जाता है.

शुभा स्कूल से वापस आकर सबसे पहले अपना बस्ता एक कोने में रखकर रोज की तरह अपने पिता भीखू के पास जाकर बैठ जाती है और दिन-भर उसने क्या-क्या किया पूरे विस्तार से बताती है और उसके पिता ने क्या-क्या किया बड़े ही प्यार से पूछती है. उस सुहानी शाम में भी वो वही सुबह वाली चुप्पी अपनी पिता ही आँखों में पढ़ पा रही थी. उसने कोशिश बहुत की की आखिर जाने वजह क्या है, पर जब नाकामयाब रही तो वो चुपचाप अपने पिता के पास ही बैठी रही और सुनती रही उनकी ख़ामोशी और पढ़ती रही उनकी आँखों की मायूसी. उसकी उम्र के बच्चों को शायद समझ ना आये मगर उसे समझ आ गई थी वजह उसके पिता की ख़ामोशी और मायूसी.

उस पूरी शाम वो यही सोचती रही की आखिर ऐसा क्या किया जाए की उसके पिता के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान बिखर जाए, या फिर कुछ ऐसा किया जाए की उसके पिता की परेशानियों कम हो जाए. आखिरकार उसके छोटे से दिमाग ने एक बड़ी तरकीब निकाल ही ली थी. उसने सोचा आने वाले त्यौहार में वो लोग भी मिट्टी की मूर्तियाँ बनाकर बेचें. वैसे भी उसके गाँव के लोग शहर जाकर कई त्यौहार जैसे गणेश उत्सव, नवरात्री, दिवाली के लिए मूर्तियाँ लाते ही हैं. अगर गाँव में ही मूर्तियाँ मिल जाये तो फिर कोई बहार क्यूँ जाये. उसे लगा शायद उसकी यह तरकीब काम कर जाए इसलिए वो जल्दी से खाना खाकर अपना होमवर्क छोड़ यही सोचने लगी कब सब घरवाले सोयें और वो मूर्ति बनाये. उसका हाथ इतना साफ़ तो नहीं था मूर्तियाँ बनाने में मगर खिलोने बनाते बनाते और अपने पिता के साथ उनपर रंग और सफाई का काम करते करते उसे इतना तो अनुभव हो ही गया था के कैसे मूर्तियाँ बनाते और उनको कैसे रूप देना है.

और जब उसने देखा सभी घरवाले गहरी नींद में है तो वो चुपके से उठी और आँगन में जाकर गणेश जी की मूर्ति बनाने की कोशिश करने लगी. पहले-पहल उसकी कुछ कोशिशें नाकामयाब रही. कभी किसी मूर्ति की सूंड बड़ी हो जाती तो कभी किसी मूर्ति का एक कान छोटा तो दूसरा बड़ा हो जाता. कभी पेट बराबर नहीं बनता तो कभी किसी के पैर. पर शुभा ने सोच लिया था उसे मूर्ति बनानी ही है इसलिए हार ना मानते हुए वो लगी रही और आखिरकार कुछ १०-१२ कोशिशों के बाद एक मूर्ति ऐसी बनी जो हर तरह से पूर्ण थी, बस उस पर रंग करना बाकी था. रंग करने में तो वो वैसे भी माहिर थी, इसलिए बिना कोई वक़्त गवाए उसने मूर्ति को रंग किया और सूखने के लिए ऐसी जगह रखा जहाँ किसी की नज़र ना पड़े और फिर चुपचाप अपने चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए अपनी माँ के पास जाकर सो गई.

अगली सुबह जब वो उठी तो उसने हमेशा की तरह उसके पिता को खिलोने और दिए बनाते हुए पाया. वो चुपके से उसके पिता का पास गए और तेज आवाज़ में बोली…

बाबा…

भीखू इस तरह अपने नाम के संबोधन से थोडा सा चोके और फिर एक हलकी सी मुस्कान के साथ अपनी पारी को गले लगा लिया. शुभा वैसे ही थोड़ी देर अपने पिता की गोद में रही और फिर बोली.

बाबा मेरे पास ना आपके लिए कुछ ख़ास बनाया है.

भीखू से थोड़े आश्चर्य से पूछा – ख़ास, क्या बनाया है बताओ तो जरा.

शुभा ने बड़े ही भोलेपन से कहाँ, ऐसे नहीं बाबा, पहले आपको अपनी आँखें बंद करनी होगी फिर ही बताउंगी.

भीखू बड़े ही प्यार से बोलता है – अच्छा चलो में आँखें बंद करता हूँ, अब चलो बताओ क्या ख़ास बनाया है.

ऐसे ही रहना बाबा, आखें मत खोलना, में अभी लेकर आई.

भीखू वैसे ही आखें बंद किये शुभा के आने का इंतज़ार करने लगता है.

शुभा भागते हुए जाती है वो गणेशजी की मूर्ति को भागते हुए लेकर आती है और बड़े ही प्यार से भीखू के हाथों में रखकर बोलती है.

बाबा अब धीरे-धीरे आँखें खोलो.

भीखू धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलता है और देखता है अपने हाथों में गणेश की एक बेहद ही ख़ूबसूरत मूर्ति. जिससे देखकर उसकी आखों से आसूं झलक जाते है. वो रुआंसे से गले से बोलता है.

ये आपने बनाई है मेरी परी.

शुभा बड़े ही भोलेपन से बोलती है:  हाँ बाबा, यह मैंने आपके लिए बनाई है और आपको पता है मैंने यह क्यूँ बने है.

भीखू शुभा के प्रशन को समझ ही नहीं पता है इसलिए शुभा से पूछता है. क्यूँ बनाई है बेटा.

शुभा अपने पिता के प्रशन का उत्तर बड़े ही भोले अंदाज़ में देती है.

आप ना बाबा बहुत परेशान रहते हो ना, क्यूंकि हमारे बनाए हुए खिलोने नहीं बिकते ना. सब गाँव वाले उस साहूकार की बड़ी दूकान पर चलते जाते हैं. तो मैंने सोचा क्यूँ ना बाबा हम भगवान की मूर्तियाँ बनाए. वैसे भी जा सारे गाँव वाले शहर जाकर भगवान की मूर्तियाँ लाते हैं. अगर हम गाँव में ही बना लेंगे तो वो सब फिर हमसे ही खरीदेंगे ना.

मेरी परी, आपने इतना सब मेरे लिए सोचा.

शुभा बड़े ही भोले अंदाज़ में बोलती है.

आप परेशान रहते हो ना, वो मुझे अच्छा नहीं लगता. अब आप खुश हो जाओ.

यह सुनकर भीखू की आँख़ें से आंसू झलक जाते है और वो शुभा को गले से लगा लेता है. शुभा जो भीखू को समझाना चाह रही थी वो समझ गया है. उसे समझ आ गया है के उसकी परेशानियों का अंत कैसे होगा, कैसे वो दिन-ब-दिन मर रहे उसके सपनों को आकर दे सकता है. कैसे वो मिट्टी के सारे सपने मिट्टी से ही साकार कर सकता है.

समाप्त.

 

भूतिया स्टेशन

विशेष हमेशा की तरह इस बार भी ऑफिस की तरफ से एक टूर पर था. वैसे तो उसके लिए टूर पर जाना कोई नई बात नहीं थी फिर भी इस बार उसे एक अजीब सी ख़ुशी हो रही थी. शायद इसलिए क्यूँकी इस बार टूर पर और कहीं नहीं उसे उसके अपने शहर जाना था. हमेशा की तरह उसने रिजर्वेशन सेकंड AC में किया हुआ था. स्टेशन वो टाइम पर पहुंचा और ट्रेन में अपने बर्थ पर सामान रखकर अपना लैपटॉप खोलकर कुछ मेल्स और लेटर्स का जवाब देने में बिजी हो गया. उसे पता ही नहीं चला कब ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली और उसका सफ़र शुरू हो गया. तकरीबन १ पूरा दिन और १२ घंटे का सफ़र तय कर वो अनजान रेलवे स्टेशन पहुंचा तो देखा आज ट्रेन कुछ ज्यादा ही देरी से चल रही है, वैसे भी अनजान से उसके शहर का सफ़र कुछ दो घंटे का बचता है तो उसने सोचा क्यूँ ना यह दूरी बस से ही तय कर ली जाए. अपना सामान उठा कर वो जैसे ही स्टेशन से बाहर निकला तो एक पागल अचानक से उसके सामने आ गया. उसे अचानक से अपने सामने पाकर विशेष पहले तो थोडा घबरा गया फिर अपने आपको सँभालते हुए उसे दूर किया. पागल पता नहीं क्या बड-बडा रहा था.

तुम मुझे कितना भी टार्चर करलो, में कुछ नहीं बताऊंगा. तुम अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही होगा. मेरे साथी तुम लोगो को नहीं छोड़ने वाले. सालों चले जाओ भारत छोड़कर. चले जाओ.

उसकी आवाज़ का दर्द और उसके चहेरे के भावों ने जैसे विशेष की आत्मा को झकझोड़ कर रख दिया. उस पल में जैसे विशेष को उस पागल के दर्द का अहसास हो गया था. उसके दिमाग में उसके कहे शब्द अब भी गूंज रहे थे, विशेष थोड़ी देर वहीँ लगी एक बेंच पर बैठ गया. ना जाने क्यूँ उसके मन में उस पागल के बारे में जानने की उत्सुकता जगी, तो पास की ही एक टी-स्टाल वाले से उसने उस पागल के बारे में जानने की कोशिश की.

अरे भैया, ये पागल कोन है और क्या ये अंग्रेजों चले जाओ भारत छोड़कर बड-बडा रहा था.

यह सुनकर टी-स्टाल वाले ने उसको उसकी कहानी बतानी शुरू की. भैया ये कोई ऐसा वैसा लड़का नहीं है, बहुत ही पड़ा-लिखा है, यही से कुछ ही दूरी पर इसका घर है. बहुत ही ऊँचे खानदान से है, इसके पुरखे एक ज़माने में यहाँ के बड़े ही, जाने-माने जमींदार हुआ करते थे. बाप-दादा का भी बड़ा ही नाम चलता था. मुझे आज भी अचछी तरह याद है वो दिन, में हर दिन की तरह उस दिन भी तकरीबन सुबह के ५ बजे अपनी दूकान खोलने आया था. उस दिन स्टेशन पर ज्याद भीड़ नहीं थी. इसलिए उन सभी लोगो का झुण्ड मुझे साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था, घबराये हुए, सहमे और चिंता की लकीरें सभी के चेहरों पर साफ़-साफ़ नज़र आ रही थीं. मुझे थोडा संकोच हुआ पर मदद करने के लिहाज से में उनके पास गया और पूछा.

अरे साहब क्या हुआ, कोई छोटा बच्चा खो गया है क्या. पहले तो उन सबने मुझे नज़रंदाज़ किया पर जब मैंने थोडा जोर दिया तो तब एक बुजुर्ग ने अपनी कापती सी आवाज़ में मुझे बताया.

हमारा २६ साल का लड़का जो कल रात को आने वाला था अभी तक घर नहीं पहुंचा है, उसका मोबाइल भी नहीं लग रहा. TC और कुछ लोगों से पूछताछ की तो पता चला की यहाँ रात में सिर्फ़ दो पैसेंजर उतरे थे, उनमे से एक विश्वास था. उसके बाद से उसे किसी ने नहीं देखा.

अजीब सा था सबकुछ, इतना बड़ा लड़का आखिर लापता कैसे हो सकता है, जरूर कुछ बात तो थी, जो वो लोग नज़रंदाज़ कर रहे थे. फिर सभी लोगों ने मिलकर उसे तलाशना शुरू किया और तकरीबन ३-४ घन्टों की कड़ी मेहनत के बाद विश्वास रैल्यार्ड में ट्रेन के डब्बे में बेहोश हालात में मिला. उसे जल्दी से एम्बुलेंस द्वारा अस्पताल ले जाया गया. जहाँ कुछ घंटों बाद उसे होश आने पर उसने जो बताया उसे सुनकर सभी के होश उड़ गए.

विशेष बड़े ही ध्यान से पूरी बात सुन रहा था, उसे आगे की बात जानने की बड़ी जल्दी थी. विशेष ने बड़ी ही उत्सुकता से पूछा.

“ऐसा क्या बताया था विश्वाश ने”

विश्वास बहुत खुश था क्यूंकि १७ साल बाद घर वापस लौट रहा था, आते वक़्त उसने इन्टरनेट पर अनजान शहर के बारे में एक से बढकर एक कहानियां पड़ी, उनमे से एक कहानी थी जिसने विश्वास का सिर्फ़ ध्यान ही अपनी तरफ नहीं खींचा बल्कि उसे सोचने पर भी मजबूर कर दिया. वो कहानी थी अनजान स्टेशन और उससे थोड़ी दूरी पर बनी अनजान जेल में होने वाली पेरानोर्मल एक्टिविटीज पर. जिसके बारे में कई अखबारों और वेबसाइट पर लिखा गया था क्यूंकि लोगो का ऐसा मानना था, वहां भूतों का डेरा था. जरूर कुछ तो गड़बड़ है वहां, क्यंकि भूत-प्रेतों पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं था विश्वास को. उसने सोचा क्यूँ ना सारे मामले के बारे में कुछ जानकारी इकठ्ठा की जाए. उसने सोचा ट्रेन रात को एक बजे स्टेशन पर आने वाली है और मानें तो रात बारह से तीन बजे का समय भूत और प्रेतों का होता है. इसलिए उसने सोचा यही सही मौका है सच जानने का, ये सब कहानियां कितनी सच्ची हैं और कितनी झूठी. ट्रेन जैसे ही स्टेशन पर पहुंची सबके पहले विश्वास ने रिटायरिंग रूम में अपना लगेज रखा और निकल पड़ा स्टेशन के उस हिस्से की तरफ जहाँ कहानियों के मुताबिक भूत और प्रेत रहते हैं.

हलकी-हलकी बहती हवा, कुत्तों और सियारों के दूर से रोने की आवाज़, झिघुरों की आवाजें, कभी-कभार किसी गाडी में होते कम्पन तो कभी रेल की पटरियों पर इधर-उधर दौड़ते चूहों के दाँतों से कुतरने की आवाजें माहोल को बहुत ही डरावना बना रही थी. विश्वास को थोडा डर तो लग रहा था मगर उसे कहानियों के पीछे छुपे सच को जानना था, इसलिए वो धीरे-धीरे क़दमों से आगे की और बढता गया. थोडा फासला तय करके वो ठीक उसी जगह जा खड़ा हुआ था, जहाँ कहानियों के मुताबिक कई घटनाएँ घटी हैं. माहोल में अचानक से एक अजीब सी ख़ामोशी पसर गई थी, विश्वास अपनी साँसों की आवाज़ सुन सकता था, हर सांस उसे जीने का अहसास दिला रही थी मगर गहरी ख़ामोशी ने उसे एक अजीब से डर से भर दिया था. वो वही खड़ा कुछ देर आस-पास की चीज़ों, जंग खाए हुए रेल के डब्बों, टूटी हुई लोहे की पटरियां, कुछ पुराने खिलोने और फटे-पुराने कपड़ों को देखता रहा और जैसे ही उसने वहां से आगे कदम बढाया, पीछे से उसने किसी का हाथ अपने कंधे पर महसूस किया. पसीने की कुछ लकीरें विश्वास के सर से चेहरे पर तैरती हुई उसके गले तक पहुंच गई, वो धीरे से पलटा तो देखता है, उसके पीछे कोई नहीं था. शायद उसे कोई वहम हुआ था, इतने में ही अचानक से ना जाने कहाँ से एक काली बिल्ली उसके ऊपर कूदती है, अचानक हुए इस हमले से विश्वास संभल नहीं पाता है और अपना संतुलन खोकर वहीं गिर जाता है. गिरने के कारण विश्वास के सर के पिछले हिस्स्से पर चोट लग जाती है जिससे थोडा-थोडा खून भी रिस रहा है. विश्वास जेब से रुमाल निकलकर चोट को साफ़ करता है, वो थोडा संभला ही था की अचानक से एक साया भयानक चीख़ के साथ उसके पास पड़े पुराने खिलोने से निकलकर रेल के एक डब्बे में गायब हो जाता है.

इस बार विश्वास थोडा सहम जाता है फिर भी जैसे-तैसे हिम्मत जुटाकर वो उस डिब्बे की तरफ बड़ता है और देखने की कोशिश करता है आखिर वो साया सचमुच था या फिर उसका कोई वहम. विश्वास जैसे ही उस डब्बे के अन्दर एक कोने से झाकने के लिए अपना सर अन्दर डालता है वैसे ही कोई उसे उस डब्बे में अन्दर खींचकर पूरी ताकत से जमीन पर पटक देता है. बहुत तेज चोट लगी थी विश्वास को इस तरह पटकने से, उठकर भागना तो दूर, विश्वास से हिला भी नहीं जा रहा था और जान पर भी बन आई थी. विश्वास को कुछ सूझ ही नहीं रहा था और जिस कोने से उस साए ने उसे अन्दर खींचा था वो अब बंद हो चुका था, अन्दर गहरा अँधेरा था और बाहर जाने का और कोई रास्ता भी नज़र नहीं आ रहा था. विश्वास ने अपनी जेब में पड़ी माचिस निकाली और जैसे ही उसने पहली तीली जलाई, वो साया उसके सामने था, विश्वास ने घबराकर तुरंत ही तीली बुझा दी, फिर थोड़ी देर अपनी साँसों को सँभालते हुए फिर से जैसे ही उसने अगली तीली जलाई एक और साया उसके सामने आ खड़ा हुआ, इस बार भी विश्वास ने घबराकर तीली झट से बुझा दी. इस बार विश्वास इतना डर गया था के उसने वापस से तीली जलाने की हिम्मत ही नहीं की. वो वही पड़ा-पड़ा सोचता रहा, आख़िर कैसे वहां से निकला जाए तभी उसकी नज़र डब्बे के दुसरे कोने में पड़ी जहाँ से थोड़ी-थोड़ी रौशनी उस डब्बे में आ रही थी. उस अँधेरे डब्बे में जैसे उसे उम्मीद की किरण मिल गई थी, जैसे-तैसे अपने आप को घसीटते, दर्द में करहाते हुए विश्वास उस कोने में पहुंच जाता है. सर पर लगी चोट और बड़ी बेहरहमी से पटके जाने से उसका सारा शरीर बुरी तरह दर्द से काँप रहा था जिसके कारण कुछ ही देर में वो बेहोश हो जाता है. कुछ देर बाद कुछ आवाजों से उसकी बेहोशी टूटती है तो जो नज़ारा वो सामने देखता है वो किसी भयानक यातना से कम नहीं था.

कई लोग बेड़ियों से बंधे हुए हैं, कुछ को बर्फ की सिल्लियों पर लिटाकर कोड़े मारे जा रहे हैं. कुछ लोगों के अंगों को गर्म लोहे की सलाखों से जलाया जा रहा है. कुछ जमीन पर पड़े तड़प रहे हैं. कुछ को उल्टा लटकाकर उनके सर को कपडे से बांधकर उसमें चूहों को छोड़ दिया गया है. और ये सब कर रहे हैं चंद वर्दी वाले अंग्रेज और जो यातनाएं सह रहे हैं वो हैं स्वतंत्रा सेनानी. विश्वास को ऐसा लगा जैसे उसे किसी ने वक़्त में पीछे धकेल दिया हो यह सब दिखाने के लिए. उसे उन सभी का दर्द अपने सीने में महसूस हो रहा था, दिमाग इस सच्चाई को मानने को तैयार ही नहीं था की वो जो देख रहा है वो सच है, साथ ही ना जाने कैसे-कैसे ख़याल उसके दिमाग में हथोड़े की तरह वार कर रहे थे. वो वैसे ही पड़ा-पड़ा सबकुछ देख और महसूस कर रहा था की अचानक एक साया पलटा और उसने उस कोने में जहाँ विश्वास लेटा हुआ था इस तरह देखा जैसे वो विश्वास को ही देख रहा है. फिर वो साया धीरे-धीरे उसकी तरफ बड़ा और उसे एक हाथ से पकड़ कर उन सभी लोगों के बीचों-बीच ला खड़ा किया. फिर उनमें से दूसरा साया आगे बड़ा और विश्वास के दोनों हाथों को बांधकर उसे एक दीवार से उल्टा लटका कर बेतहाशा कोड़े बरसाने लगता है और तब तक बरसता रहता है जब तक विश्वास बेहोश नहीं हो जाता. बीच-बीच में वो दोनों साए विश्वास से पूछते रहते…

“बता साले तेरे बाकी साथी कहाँ छुपे हैं. तुम साला लोग हमारी जूती के नीचे रहकर, हमी से गद्दारी करता है. सालों आज तुम लोगों के सर से क्रांति का भूत उतार दूंगा.”

विश्वास को जब कुछ देर बाद होश आता है वो उसी तरह उस दीवार से लटका हुआ है और वो दो साए उसी के पास खड़े हैं. फिर से उनमें से एक विश्वास के पास आकर उसके सर को दीवार से दे मारता है और अपनी ख़राश भरी आवाज़ में पूछता है…

“साले तेरी तो अब खैर नहीं, जल्दी बता तेरे बाकी साथी कहाँ है, नहीं तो आज तू मर गया समझले”

विश्वास अपनी लडखडाती सी आवाज़ में बोलता है “जरूर आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई है, में वो नहीं जो आप समझ रहे है.

विश्वास की बात सुनकर उस साए को और ज्यादा गुस्सा आता है और वो फिर से विश्वास का सर दीवार से दे मारता है और एक बार फिर से बेहोशी विश्वास को अपनी आगोश में ले लेती है. यही सिलसिला पूरी रात चलता रहा, उन सायों ने विश्वास पर भी वही सब अत्याचार किये जो बाकी स्वतंत्रा सैनानियों पर किये थे. अबकी बार विश्वास की बेहोशी अस्पताल के बेड पर टूटटी है, डॉक्टरों का कहना था की विश्वास के सर पर गहरी चोट लगने से उसके दिमाग के कुछ हिस्सों ने काम करना बंद कर दिया है जिसके कारण उसके सोचने और समझने की शक्ति ख़तम हो चुकी है. फिर भी ना जाने कैसे उसे उस रात के बारें में सब कुछ याद था, कैसे उन अँगरेज़ सिपाहियों ने उसे प्रताड़ित किया और मारा. किसी को भी विश्वास की बातों पर यकीन नहीं था मगर उसकी हालात देखकर कोई भी इस बात से इनकार भी नहीं कर पा रहा था.

साहब वो दिन है और आज का दिन, विश्वास यहीं इसी रेलवे स्टेशन के आस-पास पागलों की तरह भटकता रहता है.

यह सब सुनकर विशेष एक गहरी सोच में खो जाता है, वो वही सब सोच रहा है जो विश्वास के साथ घटा है. वो अपनी सोच में इतना खो गया है के वो भूल ही गया है के उसे अपने शहर के लिए बस पकड़ना है. टी-स्टाल वाले की ख़राश भरी आवाज़ विशेष को वापस वर्त्तमान में लाकर खड़ा कर देती है.

साहब क्या हुआ कहाँ खो गए, ये लीजिये थोडा पानी पी लीजिये.

विशेष पानी पीकर वही बैठा रहता है, ना जाने कैसे वहीँ बैठे-बैठे उसकी आँख लग जाती है और वो जब उसकी आँख खुलती है, वो अपने आपको रैल्यार्ड के उसी कोने में खड़ा पाता है जिसका जिक्र उस पान वाले ने किया था.

समाप्त.

चुन्नू

वो मुस्कुराता चेहरा, कई सारे ख्व़ाब, कई ख़्वाहिशें, कई हसरतें और कई अरमान. कैसा हो अगर उन सभी ख्वाहिशों और अरमानों को कुछ चुनिंदा लम्हे ज़ज्बे और होंसलों के रंगों से उस मुस्कुराते चेहरे पर बसी दो प्यारी आँखों में भर दे. कैसा हो अगर सिर्फ एक पल उसकी सारी दुनिया बदल दे. कैसा हो अगर सिर्फ़ एक पल उसे इतनी हिम्मत दे दे की वो मुश्किल हालातों से लड़ने को तैयार हो. सोचने या बोलने में शायद नामुमकिन सा लगता है पर है तो सच. सिर्फ एक लम्हा ही काफ़ी होता है किसी को उर्जा से भरने के लिए जो उसे सफलता की ऊँचाइयों पर ला खड़ा कर सकती है. कुछ ऐसा ही हुआ है हमारे कहानी के किरदार चुन्नू के साथ.

चुन्नू जो हमेशा की तरह अपने ख़्वाबों के इन्द्रधनुषी संसार में कई रंग के सपने और हर सपने से जुड़े संसार में खोया है, उसी चाय की टपरी के कोने में जहाँ वो काम करता है. इसी तरह वो घंटों-घंटों बैठा रहता है उसी कोने में जब तक की चाय टपरी के मालिक नन्दूराम का तगड़ा हाथ उसकी पीठ पर अपने निशा नहीं छोड़ जाता. आज भी नन्दूराम का तगड़ा हाथ चुन्नू की पीठ पर और उसकी ख़राश भरी आवाज़ चुन्नू से साथ पडता है और ला खड़ा कर देता है उसे, असल दुनिया में.

साले चुन्नू, शेख़-चिल्ली उठ और ऑफिस नंबर १०५ में ये चार चाय सक्सेना साहब के केबिन में लेकर जा. दिन-भर जा जाने किस उधेड़बुन और ख़्वाबों की रंगीन दुनिया में खोया रहता है. साले कुछ काम करेगा तो, खाने को कुछ मिलेगा. ख़्वाबों से किसी का पेट नहीं भरता. जा अब जल्दी से चल देकर आ. और सुन हमेशा की तरह वही मत रुक जाना.

चुन्नू वही खड़े सब चुपचाप सुनता रहा और कुछ देर बार एक हाथ में चाय का ट्रे और दूसरे हाथ से अपनी पीठ मलता चुन्नू निकल पडता है ऑफिस नंबर ५०१ की तरफ. वैसे चाय टपरी से ऑफिस का रास्ता है तो सिर्फ़ ५ मिनट का मगर चुन्नू ये रास्ता तकरीबन १० मिनट में तय करता है. इस छोटे से सफ़र में वो कई कीर्तिमान रच चुका होता है, कई पुरूस्कार अर्जित कर इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा चुका होता है, कई असंभव से लगने वाले लक्ष्य अपनी कड़ी मेहनत से हासिल कर चुका होता है. आज भी उसने कुछ ऐसा ही किया और छोटे-छोटे क़दमों से अपने ख़्वाबों के पुलों को पार करता पहुँच जाता है सक्सेना साहब के केबिन तक.

सक्सेना साहब का केबिन जहाँ हंसी और एक खुशनुमा माहौल रहता है आज कुछ ज्यादा ही गंभीर था. चुन्नू को लगा शायद किसी गंभीर टॉपिक पर बहस छिड़ी हुई है, इसलिए वो थोडा सा सहमा हुआ सा, केबिन में दाखिल होता है. बिना किसी आवाज़ के और किसी के काम में दखल डाले, चाय के गिलास वहां बैठे चार लोगों के सामने रखकर, चुपचाप से एक कोने में खड़ा हो जाता है. सभी उसे एक नज़र देखकर नज़रंदाज़ करते हुए अपने काम में मशगुल हो जाते हैं. चुन्नू अक्सर ऐसे कई प्रेजेंटेशन में हिस्सा ले चूका है, इसलिए किसी को भी उसके वहां होने से किसी तरह का डिस्टर्बेंस नहीं होता है. चुन्नू जब भी चाय देने आता है तो कोई न कोई प्रेजेंटेशन या बहस छिड़ी ही रहती है और उसे वो बहस और प्रेजेंटेशन बड़े ही रोचक और प्रेरणादायक लगते हैं इसीलिए वो अक्सर सब कुछ भूलकर उन्ही प्रेजेंटेशन में खो जाता है.

आज भी वो अपने पसंदीदा कोने में जहाँ हमेशा वो खड़ा रहता है, खड़ा है और इसकी नज़र केबिन के कोने में टंगी एलइडी पर है. एलइडी पर आज हमेशा की तरह कोई प्रेजेंटेशन नहीं चल रहा था, कोई मूवी थी शायद. चुन्नू को ऐसा लगा मानों जैसे आज सभी का मूड लाइट है इसलिए कोई मूवी देख रहे होंगे. पर वहां बैठे सभी के चेहरों पर तो अजीब से लकीरें खिची हुई थी, जिसे देखकर लग रहा था जैसे बहुत ही गंभीर डिस्कशन है या फिर किसी तरह की तैयारी. उनके चहेरों की लकीरों को पढकर समझना थोडा मुश्किल था इसलिए चुन्नू ने अपना सारा ध्यान एलइडी पर लगा दिया. एलइडी पर किसी फिल्म के कुछ द्रश्य चल रहे थे, जिन्हें बड़ी ही ख़ूबसूरती से एक प्रेजेंटेशन का रूप दिया गया था.

सक्सेना साहब एलइडी के सामने खड़े होकर कुछ बोल रहे थे, चुन्नू को सब-कुछ तो समझ नहीं आ रहा था पर वो इतना जरूर समझ गया था. जो कुछ भी सक्सेना साहब बोल रहे थे वो जरूर वहां बैठे लोगो को जोश से भरना और आने वाले कॉर्पोरेट चैलेंज के लिए तैयार करना है और शायद यही बात सक्सेना साहब उस फिल्म की क्लिप के ज़रिये बताने को कोशिश में हैं जिसमे नायक बोल और सुन नहीं सकता है, फिर भी उसने एक सपना अपनी आँखों में बसा लिया है, जो दुनिया की नज़र में उसके लिए पूरा होना लगभग नामुमकिन है. लोग हज़ार कोशिश करते हैं उससे वो सपना छीनने की. कई अडचने आती हैं, लोग उसकी प्रतिभा पर उँगलियाँ उठाते हैं. पूरी कोशिश करते हैं उसे नीचा दिखाने की. पर इक़बाल अपने इरादों का पक्का है, उनसे ठान लिया है, उसे अपने ख़्वाबों को साकार करना है. वो दिन रात मेहनत करता है. दुनिया से लड़ता है, हर उस इंसान को अपनी कड़ी मेहनत से अपने ख्व़ाब को सच कर करारा जवाब देता है जिसने कभी जाने, तो कभी अनजाने उसके ख़्वाबों को बेवकूफी का नाम दिया था.

वहां क्लिप में फिल्म का नायक अपने लक्ष्य को हासिल करता है और यहाँ सक्सेना साहब अपने लक्ष्य को. केबिन में बैठे सभी लोगों के चेहरे का रंग बदल चुका है, सभी उत्साहित और एक नयी उर्जा से भरे नज़र आ रहे हैं, उनके चेहरे की लकीरों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है मानों सक्सेना साहब अपने लक्ष्य को हासिल कर चुके हैं.

इधर एक कोने में खड़ा चुन्नू यह सबकुछ बड़े ही ध्यान से सुन और देख रहा है, उसके अन्दर एक ऐसा सैलाब उठा है जिसे अब रोक पाना मुश्किल है, कुछ नए ख्व़ाब आकर ले चुके हैं. आज उसे सफलता का गुरुमंत मिल गया है, उसे समझ आ गया है की सिर्फ़ ख्व़ाब देखना ही काफी नहीं. हर ख्व़ाब को हकीकत में बदलने के लिए कड़ी मेहनत और दिन-रात प्रयास करने होते हैं. और उसके लिए दिल में एक शमा जलानी पड़ती हैं जो संशय और संदेह के वक़्त में आपके होंसलों को रोशन करता है. सक्सेना साहब और अन्य लोग इस बात से अनजान थे मगर उन्होंने आज चुन्नू के दिल में ख़्वाबों की वो शमा जला दी है.

चुन्नू वहीँ कुछ देर और वैसे ही खड़ा रहता है और फिर चाय के गिलास ट्रे में रखकर वहां से निकल जाता है. अब वो वही चुन्नू नहीं जो सिर्फ़ ख्व़ाब देखना जानता था, अब उसे पता है कैसे उसे अपने ख़्वाबों को हकीकत में बदलना है, कैसे इस दुनिया में अपनी जगह बनानी है. कैसे अपनी बेरंग दुनिया को ख़्वाबों के रंगों से भरना है.

समाप्त.