भूतिया स्टेशन

विशेष हमेशा की तरह इस बार भी ऑफिस की तरफ से एक टूर पर था. वैसे तो उसके लिए टूर पर जाना कोई नई बात नहीं थी फिर भी इस बार उसे एक अजीब सी ख़ुशी हो रही थी. शायद इसलिए क्यूँकी इस बार टूर पर और कहीं नहीं उसे उसके अपने शहर जाना था. हमेशा की तरह उसने रिजर्वेशन सेकंड AC में किया हुआ था. स्टेशन वो टाइम पर पहुंचा और ट्रेन में अपने बर्थ पर सामान रखकर अपना लैपटॉप खोलकर कुछ मेल्स और लेटर्स का जवाब देने में बिजी हो गया. उसे पता ही नहीं चला कब ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ ली और उसका सफ़र शुरू हो गया. तकरीबन १ पूरा दिन और १२ घंटे का सफ़र तय कर वो अनजान रेलवे स्टेशन पहुंचा तो देखा आज ट्रेन कुछ ज्यादा ही देरी से चल रही है, वैसे भी अनजान से उसके शहर का सफ़र कुछ दो घंटे का बचता है तो उसने सोचा क्यूँ ना यह दूरी बस से ही तय कर ली जाए. अपना सामान उठा कर वो जैसे ही स्टेशन से बाहर निकला तो एक पागल अचानक से उसके सामने आ गया. उसे अचानक से अपने सामने पाकर विशेष पहले तो थोडा घबरा गया फिर अपने आपको सँभालते हुए उसे दूर किया. पागल पता नहीं क्या बड-बडा रहा था.

तुम मुझे कितना भी टार्चर करलो, में कुछ नहीं बताऊंगा. तुम अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही होगा. मेरे साथी तुम लोगो को नहीं छोड़ने वाले. सालों चले जाओ भारत छोड़कर. चले जाओ.

उसकी आवाज़ का दर्द और उसके चहेरे के भावों ने जैसे विशेष की आत्मा को झकझोड़ कर रख दिया. उस पल में जैसे विशेष को उस पागल के दर्द का अहसास हो गया था. उसके दिमाग में उसके कहे शब्द अब भी गूंज रहे थे, विशेष थोड़ी देर वहीँ लगी एक बेंच पर बैठ गया. ना जाने क्यूँ उसके मन में उस पागल के बारे में जानने की उत्सुकता जगी, तो पास की ही एक टी-स्टाल वाले से उसने उस पागल के बारे में जानने की कोशिश की.

अरे भैया, ये पागल कोन है और क्या ये अंग्रेजों चले जाओ भारत छोड़कर बड-बडा रहा था.

यह सुनकर टी-स्टाल वाले ने उसको उसकी कहानी बतानी शुरू की. भैया ये कोई ऐसा वैसा लड़का नहीं है, बहुत ही पड़ा-लिखा है, यही से कुछ ही दूरी पर इसका घर है. बहुत ही ऊँचे खानदान से है, इसके पुरखे एक ज़माने में यहाँ के बड़े ही, जाने-माने जमींदार हुआ करते थे. बाप-दादा का भी बड़ा ही नाम चलता था. मुझे आज भी अचछी तरह याद है वो दिन, में हर दिन की तरह उस दिन भी तकरीबन सुबह के ५ बजे अपनी दूकान खोलने आया था. उस दिन स्टेशन पर ज्याद भीड़ नहीं थी. इसलिए उन सभी लोगो का झुण्ड मुझे साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था, घबराये हुए, सहमे और चिंता की लकीरें सभी के चेहरों पर साफ़-साफ़ नज़र आ रही थीं. मुझे थोडा संकोच हुआ पर मदद करने के लिहाज से में उनके पास गया और पूछा.

अरे साहब क्या हुआ, कोई छोटा बच्चा खो गया है क्या. पहले तो उन सबने मुझे नज़रंदाज़ किया पर जब मैंने थोडा जोर दिया तो तब एक बुजुर्ग ने अपनी कापती सी आवाज़ में मुझे बताया.

हमारा २६ साल का लड़का जो कल रात को आने वाला था अभी तक घर नहीं पहुंचा है, उसका मोबाइल भी नहीं लग रहा. TC और कुछ लोगों से पूछताछ की तो पता चला की यहाँ रात में सिर्फ़ दो पैसेंजर उतरे थे, उनमे से एक विश्वास था. उसके बाद से उसे किसी ने नहीं देखा.

अजीब सा था सबकुछ, इतना बड़ा लड़का आखिर लापता कैसे हो सकता है, जरूर कुछ बात तो थी, जो वो लोग नज़रंदाज़ कर रहे थे. फिर सभी लोगों ने मिलकर उसे तलाशना शुरू किया और तकरीबन ३-४ घन्टों की कड़ी मेहनत के बाद विश्वास रैल्यार्ड में ट्रेन के डब्बे में बेहोश हालात में मिला. उसे जल्दी से एम्बुलेंस द्वारा अस्पताल ले जाया गया. जहाँ कुछ घंटों बाद उसे होश आने पर उसने जो बताया उसे सुनकर सभी के होश उड़ गए.

विशेष बड़े ही ध्यान से पूरी बात सुन रहा था, उसे आगे की बात जानने की बड़ी जल्दी थी. विशेष ने बड़ी ही उत्सुकता से पूछा.

“ऐसा क्या बताया था विश्वाश ने”

विश्वास बहुत खुश था क्यूंकि १७ साल बाद घर वापस लौट रहा था, आते वक़्त उसने इन्टरनेट पर अनजान शहर के बारे में एक से बढकर एक कहानियां पड़ी, उनमे से एक कहानी थी जिसने विश्वास का सिर्फ़ ध्यान ही अपनी तरफ नहीं खींचा बल्कि उसे सोचने पर भी मजबूर कर दिया. वो कहानी थी अनजान स्टेशन और उससे थोड़ी दूरी पर बनी अनजान जेल में होने वाली पेरानोर्मल एक्टिविटीज पर. जिसके बारे में कई अखबारों और वेबसाइट पर लिखा गया था क्यूंकि लोगो का ऐसा मानना था, वहां भूतों का डेरा था. जरूर कुछ तो गड़बड़ है वहां, क्यंकि भूत-प्रेतों पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं था विश्वास को. उसने सोचा क्यूँ ना सारे मामले के बारे में कुछ जानकारी इकठ्ठा की जाए. उसने सोचा ट्रेन रात को एक बजे स्टेशन पर आने वाली है और मानें तो रात बारह से तीन बजे का समय भूत और प्रेतों का होता है. इसलिए उसने सोचा यही सही मौका है सच जानने का, ये सब कहानियां कितनी सच्ची हैं और कितनी झूठी. ट्रेन जैसे ही स्टेशन पर पहुंची सबके पहले विश्वास ने रिटायरिंग रूम में अपना लगेज रखा और निकल पड़ा स्टेशन के उस हिस्से की तरफ जहाँ कहानियों के मुताबिक भूत और प्रेत रहते हैं.

हलकी-हलकी बहती हवा, कुत्तों और सियारों के दूर से रोने की आवाज़, झिघुरों की आवाजें, कभी-कभार किसी गाडी में होते कम्पन तो कभी रेल की पटरियों पर इधर-उधर दौड़ते चूहों के दाँतों से कुतरने की आवाजें माहोल को बहुत ही डरावना बना रही थी. विश्वास को थोडा डर तो लग रहा था मगर उसे कहानियों के पीछे छुपे सच को जानना था, इसलिए वो धीरे-धीरे क़दमों से आगे की और बढता गया. थोडा फासला तय करके वो ठीक उसी जगह जा खड़ा हुआ था, जहाँ कहानियों के मुताबिक कई घटनाएँ घटी हैं. माहोल में अचानक से एक अजीब सी ख़ामोशी पसर गई थी, विश्वास अपनी साँसों की आवाज़ सुन सकता था, हर सांस उसे जीने का अहसास दिला रही थी मगर गहरी ख़ामोशी ने उसे एक अजीब से डर से भर दिया था. वो वही खड़ा कुछ देर आस-पास की चीज़ों, जंग खाए हुए रेल के डब्बों, टूटी हुई लोहे की पटरियां, कुछ पुराने खिलोने और फटे-पुराने कपड़ों को देखता रहा और जैसे ही उसने वहां से आगे कदम बढाया, पीछे से उसने किसी का हाथ अपने कंधे पर महसूस किया. पसीने की कुछ लकीरें विश्वास के सर से चेहरे पर तैरती हुई उसके गले तक पहुंच गई, वो धीरे से पलटा तो देखता है, उसके पीछे कोई नहीं था. शायद उसे कोई वहम हुआ था, इतने में ही अचानक से ना जाने कहाँ से एक काली बिल्ली उसके ऊपर कूदती है, अचानक हुए इस हमले से विश्वास संभल नहीं पाता है और अपना संतुलन खोकर वहीं गिर जाता है. गिरने के कारण विश्वास के सर के पिछले हिस्स्से पर चोट लग जाती है जिससे थोडा-थोडा खून भी रिस रहा है. विश्वास जेब से रुमाल निकलकर चोट को साफ़ करता है, वो थोडा संभला ही था की अचानक से एक साया भयानक चीख़ के साथ उसके पास पड़े पुराने खिलोने से निकलकर रेल के एक डब्बे में गायब हो जाता है.

इस बार विश्वास थोडा सहम जाता है फिर भी जैसे-तैसे हिम्मत जुटाकर वो उस डिब्बे की तरफ बड़ता है और देखने की कोशिश करता है आखिर वो साया सचमुच था या फिर उसका कोई वहम. विश्वास जैसे ही उस डब्बे के अन्दर एक कोने से झाकने के लिए अपना सर अन्दर डालता है वैसे ही कोई उसे उस डब्बे में अन्दर खींचकर पूरी ताकत से जमीन पर पटक देता है. बहुत तेज चोट लगी थी विश्वास को इस तरह पटकने से, उठकर भागना तो दूर, विश्वास से हिला भी नहीं जा रहा था और जान पर भी बन आई थी. विश्वास को कुछ सूझ ही नहीं रहा था और जिस कोने से उस साए ने उसे अन्दर खींचा था वो अब बंद हो चुका था, अन्दर गहरा अँधेरा था और बाहर जाने का और कोई रास्ता भी नज़र नहीं आ रहा था. विश्वास ने अपनी जेब में पड़ी माचिस निकाली और जैसे ही उसने पहली तीली जलाई, वो साया उसके सामने था, विश्वास ने घबराकर तुरंत ही तीली बुझा दी, फिर थोड़ी देर अपनी साँसों को सँभालते हुए फिर से जैसे ही उसने अगली तीली जलाई एक और साया उसके सामने आ खड़ा हुआ, इस बार भी विश्वास ने घबराकर तीली झट से बुझा दी. इस बार विश्वास इतना डर गया था के उसने वापस से तीली जलाने की हिम्मत ही नहीं की. वो वही पड़ा-पड़ा सोचता रहा, आख़िर कैसे वहां से निकला जाए तभी उसकी नज़र डब्बे के दुसरे कोने में पड़ी जहाँ से थोड़ी-थोड़ी रौशनी उस डब्बे में आ रही थी. उस अँधेरे डब्बे में जैसे उसे उम्मीद की किरण मिल गई थी, जैसे-तैसे अपने आप को घसीटते, दर्द में करहाते हुए विश्वास उस कोने में पहुंच जाता है. सर पर लगी चोट और बड़ी बेहरहमी से पटके जाने से उसका सारा शरीर बुरी तरह दर्द से काँप रहा था जिसके कारण कुछ ही देर में वो बेहोश हो जाता है. कुछ देर बाद कुछ आवाजों से उसकी बेहोशी टूटती है तो जो नज़ारा वो सामने देखता है वो किसी भयानक यातना से कम नहीं था.

कई लोग बेड़ियों से बंधे हुए हैं, कुछ को बर्फ की सिल्लियों पर लिटाकर कोड़े मारे जा रहे हैं. कुछ लोगों के अंगों को गर्म लोहे की सलाखों से जलाया जा रहा है. कुछ जमीन पर पड़े तड़प रहे हैं. कुछ को उल्टा लटकाकर उनके सर को कपडे से बांधकर उसमें चूहों को छोड़ दिया गया है. और ये सब कर रहे हैं चंद वर्दी वाले अंग्रेज और जो यातनाएं सह रहे हैं वो हैं स्वतंत्रा सेनानी. विश्वास को ऐसा लगा जैसे उसे किसी ने वक़्त में पीछे धकेल दिया हो यह सब दिखाने के लिए. उसे उन सभी का दर्द अपने सीने में महसूस हो रहा था, दिमाग इस सच्चाई को मानने को तैयार ही नहीं था की वो जो देख रहा है वो सच है, साथ ही ना जाने कैसे-कैसे ख़याल उसके दिमाग में हथोड़े की तरह वार कर रहे थे. वो वैसे ही पड़ा-पड़ा सबकुछ देख और महसूस कर रहा था की अचानक एक साया पलटा और उसने उस कोने में जहाँ विश्वास लेटा हुआ था इस तरह देखा जैसे वो विश्वास को ही देख रहा है. फिर वो साया धीरे-धीरे उसकी तरफ बड़ा और उसे एक हाथ से पकड़ कर उन सभी लोगों के बीचों-बीच ला खड़ा किया. फिर उनमें से दूसरा साया आगे बड़ा और विश्वास के दोनों हाथों को बांधकर उसे एक दीवार से उल्टा लटका कर बेतहाशा कोड़े बरसाने लगता है और तब तक बरसता रहता है जब तक विश्वास बेहोश नहीं हो जाता. बीच-बीच में वो दोनों साए विश्वास से पूछते रहते…

“बता साले तेरे बाकी साथी कहाँ छुपे हैं. तुम साला लोग हमारी जूती के नीचे रहकर, हमी से गद्दारी करता है. सालों आज तुम लोगों के सर से क्रांति का भूत उतार दूंगा.”

विश्वास को जब कुछ देर बाद होश आता है वो उसी तरह उस दीवार से लटका हुआ है और वो दो साए उसी के पास खड़े हैं. फिर से उनमें से एक विश्वास के पास आकर उसके सर को दीवार से दे मारता है और अपनी ख़राश भरी आवाज़ में पूछता है…

“साले तेरी तो अब खैर नहीं, जल्दी बता तेरे बाकी साथी कहाँ है, नहीं तो आज तू मर गया समझले”

विश्वास अपनी लडखडाती सी आवाज़ में बोलता है “जरूर आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई है, में वो नहीं जो आप समझ रहे है.

विश्वास की बात सुनकर उस साए को और ज्यादा गुस्सा आता है और वो फिर से विश्वास का सर दीवार से दे मारता है और एक बार फिर से बेहोशी विश्वास को अपनी आगोश में ले लेती है. यही सिलसिला पूरी रात चलता रहा, उन सायों ने विश्वास पर भी वही सब अत्याचार किये जो बाकी स्वतंत्रा सैनानियों पर किये थे. अबकी बार विश्वास की बेहोशी अस्पताल के बेड पर टूटटी है, डॉक्टरों का कहना था की विश्वास के सर पर गहरी चोट लगने से उसके दिमाग के कुछ हिस्सों ने काम करना बंद कर दिया है जिसके कारण उसके सोचने और समझने की शक्ति ख़तम हो चुकी है. फिर भी ना जाने कैसे उसे उस रात के बारें में सब कुछ याद था, कैसे उन अँगरेज़ सिपाहियों ने उसे प्रताड़ित किया और मारा. किसी को भी विश्वास की बातों पर यकीन नहीं था मगर उसकी हालात देखकर कोई भी इस बात से इनकार भी नहीं कर पा रहा था.

साहब वो दिन है और आज का दिन, विश्वास यहीं इसी रेलवे स्टेशन के आस-पास पागलों की तरह भटकता रहता है.

यह सब सुनकर विशेष एक गहरी सोच में खो जाता है, वो वही सब सोच रहा है जो विश्वास के साथ घटा है. वो अपनी सोच में इतना खो गया है के वो भूल ही गया है के उसे अपने शहर के लिए बस पकड़ना है. टी-स्टाल वाले की ख़राश भरी आवाज़ विशेष को वापस वर्त्तमान में लाकर खड़ा कर देती है.

साहब क्या हुआ कहाँ खो गए, ये लीजिये थोडा पानी पी लीजिये.

विशेष पानी पीकर वही बैठा रहता है, ना जाने कैसे वहीँ बैठे-बैठे उसकी आँख लग जाती है और वो जब उसकी आँख खुलती है, वो अपने आपको रैल्यार्ड के उसी कोने में खड़ा पाता है जिसका जिक्र उस पान वाले ने किया था.

समाप्त.

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