मिट्टी के सपने.

सुबह के तकरीबन ६ बज रहे थे. मौसम में थोड़ी नमी थी और हवा भी हलके हलके बह रही थी. गाँव की एक छोटी सी झोपडी के एक कोने में मिट्टी के बिछोने पर शुभा दुनिया से बेख़बर मिट्टी के सपनों में खोई हुई थी. शुभा कहने को तो सिर्फ़ १३ साल की है मगर बातों और समझदारी में किसी बड़ी उम्रवालों से कम नहीं है. रंगबिरंगे सपने देखना और उन सपनों के लिए जी तोड़ मेहनत करना, सिर्फ़ यही सीखा है उसने. अपनी मेहनत और सच्ची लगन की बदौलत ही उसने पिछले साल १० कक्षा के बोर्ड एग्जाम में पूरे जिले में टॉप किया था. इतना ही नहीं उसकी इस उपलब्धि पर कलेक्टर द्वारा उसे वार्षिक उत्सव के दौरान सम्मानित भी किया गया था. शुभा आज भी रंगबिरंगे सपनों में खोई हुई है तभी उसके रंगबिरंगे सपनों में एक ख़राश भरी आवाज़ खलल पैदा कर देती है. भीखू कुम्हार शुभा के पिता, बड़े ही प्यार से शुभा को उठाने की कोशिश कर रहे हैं.

उठ जा बेटा, आज बहुत सारे खिलोने बनाने हैं.

भीखू कुम्हार का एक छोटा सा परिवार है. कुल मिलाकर ५ सदस्य हैं परिवार में, भीखू, उसकी पत्नी, शुभा और उसके बूढ़े माता-पिता. भीखू कुम्हार मिट्टी के खिलोनें, मटके और दिये वगेरह बनाकर अपना पूरा परिवार पालता है. पर पिछले कुछ सालों में प्लास्टिक के खिलोनें और चीनी मिट्टी के दीयों का प्रचलन बड़ने से भीखू कुम्हार का व्यापार कुछ थम सा गया है. जहाँ वो महीनेभर में ८-१० हज़ार के खिलोनें, दिये और मटके बेच दिया करते थे, वो अब गिरकर सिर्फ़ ३ हज़ार रूपए रह गए हैं और इतने कम रुपये में पूरे घर का ख़र्च चलाना बहुत मुश्किल हो चला है और कुछ दिनों से माँ की तबियत भी बिगड़ने लगी थी. और रही सही कसर गाँव के सबसे बड़े साहूकार ने गाँव में खिलोनों की दूकान खोलकर पूरी कर दी थी, जहाँ कई तरह के खिलोनें थे जैसे चाबी घुमाने पर करतब दिखाता बन्दर, उड़ने वाला प्लेन, सरपट दौडती कार और ना जाने क्या-क्या. ऐसे में भीखू कुम्हार के खिलोनें कौन ख़रीदता, अब तो जो इनकम ३ हज़ार थी, वो भी आधी रह गई थी. फिर भी भीखू कुम्हार ने हार नहीं मानी थी, वो आज भी उसी लगन से खिलोनें बनाता और सारे गाँव में घूम-घूमकर खिलोनें बेचने की कोशिश करता. और उसकी हर कोशिश में उसके साथ होती शुभा, उसकी नन्ही परी.

शुभा आज भी हमेशा की तरह उठकर खिलोनें बनाने में भीखू की मदद करती है, फिर खिलोनों पर रंग लगाती है, उन्हें सूखने के लिए एक कोने में रख देती और फिर सूखे खिलोंनों और दीयों को अलग रखकर बेचने के लिए तैयार कर देती. इस बीच दोनों बाप-बेटी बहुत मस्ती करते, हंसी के ठहाके पूरे आंगन में गूंज जाते, मगर आज उसके पिता जो हमेशा उसके साथ हस्ते और खेलते थे आज बहुत देर से चुप थे और उसकी इस चुप्पी को बहुत देर से पड़ रही थी शुभा. उसे इस चुप्पी और ख़ामोशी का मतलब शायद समझ आ गया था, इसीलिए वो अपने बाबा का थोडा ध्यान बाटने की कोशिश करती है.

देखो बाबा, मैंने रंग कर दिया है इन खिलोनों पर. देखो ये राजकुमारी कैसी लग रही है.

भीखू बड़े ही प्यार से शुभा की तरफ देखकर बोलता है.

सुन्दर, बिल्कुल मेरी नन्ही परी जैसी.

इतना बोलकर भीखू फिर से चक्के के पास बैठ फिर से गहरी सोच में खो जाता है.

शुभा जो बहुत देर से अपने पिता का ध्यान बाटने की कोशिश कर रही थी, अपनी कोशिशों को नाकामयाब होते देख थोड़ी मायूस ज़रूर होती है मगर उसे पता है अपने पिता को हँसाने के लिए क्या करना है.

शुभा चुपके से भीखू के पास जाती है और गुदगुदी करती है, इस तरह अचानक से शुभा के गुदगुदी करने से भीखू हसने लगता है और साथ में शुभा भी खिलखिला कर हसने लगती है. भीखू अपनी नन्ही सी परी शुभा को गले लगा लेता है. थोड़ी देर बाद दोनों तैयार खिलोनों को टोकरी में रखते हैं और भीखू टोकरी लेकर गाँव में बेचने के लिए निकल जाता है और शुभा स्कूल जाने के लिए तेयारी करने लगती है.

दिनभर भीखू कड़ी धूप में घर-घर जाकर खिलोनें बेचने की फिर से एक नाकामयाब कोशिश करता है और जब कुछ ज्यादा खिलोने नहीं बिकते तो थकहारकर तकरीबन ४ बजे घर वापस आ जाता है. रोज की तरह भीखू कुछ वक़्त अपने बूढ़े माता-पिता के पास बैठता है और फिर अपनी पत्नी के साथ खाना खाकर आराम करने चला जाता है.

शुभा स्कूल से वापस आकर सबसे पहले अपना बस्ता एक कोने में रखकर रोज की तरह अपने पिता भीखू के पास जाकर बैठ जाती है और दिन-भर उसने क्या-क्या किया पूरे विस्तार से बताती है और उसके पिता ने क्या-क्या किया बड़े ही प्यार से पूछती है. उस सुहानी शाम में भी वो वही सुबह वाली चुप्पी अपनी पिता ही आँखों में पढ़ पा रही थी. उसने कोशिश बहुत की की आखिर जाने वजह क्या है, पर जब नाकामयाब रही तो वो चुपचाप अपने पिता के पास ही बैठी रही और सुनती रही उनकी ख़ामोशी और पढ़ती रही उनकी आँखों की मायूसी. उसकी उम्र के बच्चों को शायद समझ ना आये मगर उसे समझ आ गई थी वजह उसके पिता की ख़ामोशी और मायूसी.

उस पूरी शाम वो यही सोचती रही की आखिर ऐसा क्या किया जाए की उसके पिता के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान बिखर जाए, या फिर कुछ ऐसा किया जाए की उसके पिता की परेशानियों कम हो जाए. आखिरकार उसके छोटे से दिमाग ने एक बड़ी तरकीब निकाल ही ली थी. उसने सोचा आने वाले त्यौहार में वो लोग भी मिट्टी की मूर्तियाँ बनाकर बेचें. वैसे भी उसके गाँव के लोग शहर जाकर कई त्यौहार जैसे गणेश उत्सव, नवरात्री, दिवाली के लिए मूर्तियाँ लाते ही हैं. अगर गाँव में ही मूर्तियाँ मिल जाये तो फिर कोई बहार क्यूँ जाये. उसे लगा शायद उसकी यह तरकीब काम कर जाए इसलिए वो जल्दी से खाना खाकर अपना होमवर्क छोड़ यही सोचने लगी कब सब घरवाले सोयें और वो मूर्ति बनाये. उसका हाथ इतना साफ़ तो नहीं था मूर्तियाँ बनाने में मगर खिलोने बनाते बनाते और अपने पिता के साथ उनपर रंग और सफाई का काम करते करते उसे इतना तो अनुभव हो ही गया था के कैसे मूर्तियाँ बनाते और उनको कैसे रूप देना है.

और जब उसने देखा सभी घरवाले गहरी नींद में है तो वो चुपके से उठी और आँगन में जाकर गणेश जी की मूर्ति बनाने की कोशिश करने लगी. पहले-पहल उसकी कुछ कोशिशें नाकामयाब रही. कभी किसी मूर्ति की सूंड बड़ी हो जाती तो कभी किसी मूर्ति का एक कान छोटा तो दूसरा बड़ा हो जाता. कभी पेट बराबर नहीं बनता तो कभी किसी के पैर. पर शुभा ने सोच लिया था उसे मूर्ति बनानी ही है इसलिए हार ना मानते हुए वो लगी रही और आखिरकार कुछ १०-१२ कोशिशों के बाद एक मूर्ति ऐसी बनी जो हर तरह से पूर्ण थी, बस उस पर रंग करना बाकी था. रंग करने में तो वो वैसे भी माहिर थी, इसलिए बिना कोई वक़्त गवाए उसने मूर्ति को रंग किया और सूखने के लिए ऐसी जगह रखा जहाँ किसी की नज़र ना पड़े और फिर चुपचाप अपने चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए अपनी माँ के पास जाकर सो गई.

अगली सुबह जब वो उठी तो उसने हमेशा की तरह उसके पिता को खिलोने और दिए बनाते हुए पाया. वो चुपके से उसके पिता का पास गए और तेज आवाज़ में बोली…

बाबा…

भीखू इस तरह अपने नाम के संबोधन से थोडा सा चोके और फिर एक हलकी सी मुस्कान के साथ अपनी पारी को गले लगा लिया. शुभा वैसे ही थोड़ी देर अपने पिता की गोद में रही और फिर बोली.

बाबा मेरे पास ना आपके लिए कुछ ख़ास बनाया है.

भीखू से थोड़े आश्चर्य से पूछा – ख़ास, क्या बनाया है बताओ तो जरा.

शुभा ने बड़े ही भोलेपन से कहाँ, ऐसे नहीं बाबा, पहले आपको अपनी आँखें बंद करनी होगी फिर ही बताउंगी.

भीखू बड़े ही प्यार से बोलता है – अच्छा चलो में आँखें बंद करता हूँ, अब चलो बताओ क्या ख़ास बनाया है.

ऐसे ही रहना बाबा, आखें मत खोलना, में अभी लेकर आई.

भीखू वैसे ही आखें बंद किये शुभा के आने का इंतज़ार करने लगता है.

शुभा भागते हुए जाती है वो गणेशजी की मूर्ति को भागते हुए लेकर आती है और बड़े ही प्यार से भीखू के हाथों में रखकर बोलती है.

बाबा अब धीरे-धीरे आँखें खोलो.

भीखू धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलता है और देखता है अपने हाथों में गणेश की एक बेहद ही ख़ूबसूरत मूर्ति. जिससे देखकर उसकी आखों से आसूं झलक जाते है. वो रुआंसे से गले से बोलता है.

ये आपने बनाई है मेरी परी.

शुभा बड़े ही भोलेपन से बोलती है:  हाँ बाबा, यह मैंने आपके लिए बनाई है और आपको पता है मैंने यह क्यूँ बने है.

भीखू शुभा के प्रशन को समझ ही नहीं पता है इसलिए शुभा से पूछता है. क्यूँ बनाई है बेटा.

शुभा अपने पिता के प्रशन का उत्तर बड़े ही भोले अंदाज़ में देती है.

आप ना बाबा बहुत परेशान रहते हो ना, क्यूंकि हमारे बनाए हुए खिलोने नहीं बिकते ना. सब गाँव वाले उस साहूकार की बड़ी दूकान पर चलते जाते हैं. तो मैंने सोचा क्यूँ ना बाबा हम भगवान की मूर्तियाँ बनाए. वैसे भी जा सारे गाँव वाले शहर जाकर भगवान की मूर्तियाँ लाते हैं. अगर हम गाँव में ही बना लेंगे तो वो सब फिर हमसे ही खरीदेंगे ना.

मेरी परी, आपने इतना सब मेरे लिए सोचा.

शुभा बड़े ही भोले अंदाज़ में बोलती है.

आप परेशान रहते हो ना, वो मुझे अच्छा नहीं लगता. अब आप खुश हो जाओ.

यह सुनकर भीखू की आँख़ें से आंसू झलक जाते है और वो शुभा को गले से लगा लेता है. शुभा जो भीखू को समझाना चाह रही थी वो समझ गया है. उसे समझ आ गया है के उसकी परेशानियों का अंत कैसे होगा, कैसे वो दिन-ब-दिन मर रहे उसके सपनों को आकर दे सकता है. कैसे वो मिट्टी के सारे सपने मिट्टी से ही साकार कर सकता है.

समाप्त.

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