दहशत से भरे वो दस घंटे…

विजय और उसका पूरा परिवार हर रात खाने के बाद लिविंग रूम में बैठे दिन-भर की दिनचर्या पर बातचीत करते हैं. ये उनकी रोज की दिनचर्या है, रोज रात खाने के बाद का एक घंटा पूरा परिवार साथ बैठकर या तो दिनभर क्या-क्या हुआ इस बात पर बातचीत करता हैं या फिर कभी कभार परिवार से जुड़े किसी मुद्दे पर बहस करते नज़र आता है. ये एक घंटा उन सभी के जीवन का वो अटूट हिस्सा है जिसमे वे सभी एक दूसरे के साथ कुछ ख़ास पल बीताते हैं. आपबीती साझा करते हैं. कुछ चुनिन्दा लम्हों को यादों के मर्तबान में आने वाले जीवन के लिए सहेज कर रखते हैं.

उस दिन भी विजय और उसका सारा परिवार कुछ ख़ास लम्हों को यादों में सहेज रहा था, तभी उन सबका ध्यान अचानक से मचे शोर ने अपनी तरफ खींच लिया. पहले लगा शायद किसी मिया-बीवी का झगडा होगा क्यूंकि उनके मोहल्ले में ऐसे झगडे होना एक आम बात थी. जहाँ शराबी मिया अक्सर टली होकर आता है और अपनी मर्दानगी का सबूत अपनी बीवी को पीटकर देता है. इसलिए सभी ने झगडे पर ज्यादा ध्यान न देते हुए अपनी बातचीत को जारी रखा. परन्तु जब झगडे का शोर और भी ज्यादा बढता गया तो सभी ने सोचा शायद कुछ बड़ी बात है इसलिए बालकनी से झाककर झगडे की वजह जानने की कोशिश की. काफी कोशिश करने के बाद पता चला शहर में संप्रादियक दंगे छिड गए हैं और बड़ते-बड़ते उनके मोहल्ले तक आ पहुंचे हैं. दंगाई सभी घरों को तहस-नहस कर रहे हैं और जो लोग सामने आ रहे हैं उन्हें क़त्ल कर रहे हैं.

यह सब जानकार सभी के चेहरों का रंग उड़ सा गया था, सभी यही सोच कर डर रहे थे की कहीं दंगाई उनके घर ना आ जाएँ. तभी अचानक उनके घर के दरवाजे पर जोर-जोर से होती खटखटाहट ने सभी का ध्यान अपनी और खींच लिया. आवाज़ सुनकर सभी के चेहरों पर कुछ अजीब सी लकीरें खिंच आई थी. हाथ पैर काँप रहे थे और आवाज़ डर के मारे हलक में ही अटक गई थी. किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था की आखिर इस वक़्त करे तो क्या करें. तभी अचानक दरवाजे से आती आवाजें और भी तेज हो गयी, तो सभी को ऐसा लगा मानों जैसे ये भीड़ उन्हें आज मार कर ही दम लेगी.

इसी सब के बीच विजय को ध्यान आता है उनके घर में नीचे की तरफ एक बड़ा सा कमरा है जिसमे बहुत सारा पुराना सामान और कुछ पुश्तैनी कागजात पड़े हुए है. कमरे में गहरा अँधेरा रहता है और काफी बड़ा होने के कारण किसी को वहां ढूँढना जैसे नामुमकिन सा है. विजय सभी को लेकर तेजी से उस कमरे की और बढता है और सभी को चुपचाप वहां छुपाकर, दंगाइयों के जाने का इंतज़ार करने लगता है.

बहुत देर तक लोगों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें आती रही और तभी एक तेज आवाज़ के साथ आवाजें और भी तेज हो गई. शायद दंगाई घर का दरवाज़ा तोड़कर घर के अन्दर आने में सफल हो गए थे. सभी डरे-सहमे उस कमरे के एक कोने में बैठे यही प्रार्थना कर रहे थे की दंगाई इस कमरे की तरफ ना आयें. दंगाई अगले ३० मिनट तक घर का सामान तोड़ते रहे और जो कुछ कीमती सामान था उसे साथ ले जाने के लिए एक बोरे में भरते जा रहे थे. जब पूरा घर तलाश करने के बाद दंगाइयों को वहां कोई नहीं मिला और घर का सारा कीमती सामान उन्होंने बटोर लिया तो वो वहां से चले गए. कुछ सेकंड्स के लिए वहां एक अनजाने सन्नाटे ने अपने पैर पसार लिए. ऐसा लग रहा था जैसे वहां कुछ हुआ ही नहीं हो. मगर अभी भी थोड़ी दूरी से लोगों की चीत-पुकार और चिल्लाने की आवाजें आ रही थी. विजय और उसका परिवार अब भी वहीँ छुपे थे इसी इंतज़ार में के कब ये दंगे शांत हो और कब वो उस कमरे से निकलकर घर में प्रवेश करें. मगर अगले कुछ घंटों तक लोगों के चीखने-चिल्लाने और शोर की आवाजें कम होने के बजाये बढती रहीं.

विजय और उसका पूरा परिवार उसी कमरे में भूखे-प्यासे अगले दस घंटे वहीँ रहे. अब डर थोडा ख़तम होने लगा था और बाहर से आने वाली आवाजें भी लगभग बंद हो चुकी थी. कभी कभार जरूर एक चीख सुनाई दे जाती थी. इसलिए उन्होंने उस कमरे से निकल कर घर में वापस जाने का फैसला किया. डरते डरते विजय और उसका पूरा परिवार उस कमरे से निकल कर लिविंग रूम में आते हैं. सभी सामान इधर उधर फैला हुआ है, जो कुछ कीमती सामान था वो सब दंगाई ले जा चुके हैं और जो नहीं ले जा सकते थे उसे तहस नहस कर दिया है. घर का ऐसा हाल देखकर सभी की आँखें नम हो चुकी हैं. विजय ने जल्दी से भागकर जैसे-तैसे सामने का दरवाज़ा बंद किया और रेडियो को धीमी आवाज़ में चालू किया तो पता चला. शहर में हुए दंगे अब शांत हो चुके हैं और मिलिट्री ने पूरे शहर को एक छावनी में तब्दील कर दिया है ताकि फिर से किसी भी वजह से दंगे ना भड़क सकें. विजय और उसके पूरे परिवार ने ऊपरवाले का शुक्रियाअदा किया और अस्त-व्यस्त सामान को फिर से व्यस्थित करने में लग गए.

बहुत कुछ बदल कर रख दिया था इन दो दिनों ने जिसे सही करते-करते सालों लग गए. जो नहीं बदली थी वो थी विजय और उसके परिवार के साथ खाना खाने की और खाने के बाद कुछ चुनिन्दा लम्हों को यादों में सहेझने की आदत. पर अब इन यादों में कुछ यादें उन दहशत भरे दस घंटों की भी हैं जो विजय और उसके परिवार ने उस अँधेरे कमरे में चीत-पुकार और चिल्लाने की आवाजों के बीच बिताई थी.

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