अभिमन्यु और चक्रव्यूह

युद्धभूमि सूरज की लालिमा से जगमगा रही है, प्रचंड शोर, पृथ्वी से उड़ती धूल, घोड़ों के टापुओं के तीव्र स्वर और धनुष की टंकार गूँज रही है युद्धभूमि में. एक तरफ जहाँ महासागर जैसा विशाल सैनिक दल, जिसका नेत्रत्व गुरुओं में सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रौण कर रहे हैं, जिनके साथ देने अनेक महायोद्धा जिनमे हैं सुर्यपुत्र कर्ण, दुशासन, दुर्योधन, अश्वत्थामा, मद्रनरेश, कुलगुरु और शकुनी तत्पर हैं. वही दूसरी और पांडव, श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में बड़ी से बड़ी विपत्ति से लड़ने में सक्षम युद्ध के शंखनाद की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

आज सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रौण ने चक्रव्यूह की रचना विशेष रूप से युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध को आज ही समाप्त करने के उद्देश्य से की है, परंतु इसमे सबसे बड़ी बाधा है धनुर्धारी अर्जुन, जो इस चक्रव्यूह को तहस-नहस करना भलीभाती जानता है. पर शकुनी और दुर्योधन ने अपनी कुटिलनीती से पहले ही अर्जुन को युद्धभूमि से कोसो दूर दूसरे प्रायोजन से भेजने का प्रबन्ध किया हुआ है ताकि उन्हे युधिष्ठिर को बँधी बनाने में किसी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े. शंखनाद से युद्ध की घोषणा होते ही जैसे पांडव पक्ष किसी दुविधा में फस गये, उन्हे इस समस्या का कोई उपाय सूझ ही नहीं रहा था, तभी उनकी इस चिंता का उपाय बनकर अभिमन्यु सामने आता है.

अभिमन्यु: ज्येष्ठ पिताश्री मुझे आज्ञा दीजिए मुझे चक्रव्यूह के अंदर प्रवेश करने का मार्ग ज्ञात हैं, मैने श्री कृष्ण से सुना था.

युधिष्ठिर: नहीं अभिमन्यु, में तुम्हे चक्रव्यूह में प्रवेश की आज्ञा नहीं दे सकता. ये अनुचित होगा.

अभिमन्यु: अनुचित तो तब होगा ज्येष्ठ पिताश्री, जब हम गुरु द्रौण की चुनौती का उत्तर नहीं देंगे.

युधिष्ठिर: नहीं में तुम्हे आज्ञा नहीं दे सकता, तुम्हारी सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है.

अभिमन्यु: मुझे भला आप सभी के होते क्या हो सकता है, पिताश्री.

युधिष्ठिर: नहीं अभिमन्यु फिर भी में तुम्हे चक्व्यूह में प्रवेश की आज्ञा नहीं दे सकता.

अभिमन्यु: परन्तु क्यूँ पिताश्री, क्या आपको मेरे युद्ध कौशल पर भरोसा नहीं. क्या आपको लगता है में कौरव सेना का सामना नहीं कर सकता. अपने शब्दों के लिए क्षमा चाहता हूँ पिताश्री, पर आप शायद भूल रहे हैं में श्री कृष्ण का शिष्य और महान धनुर्धारी अर्जुन का पुत्र हूँ. मुझमें भी असीम सहास और वीरता का संचार करता पांडव वंश का रक्त बह रहा है.

युधिष्ठिर: पुत्र मुझे तुम्हारी वीरता और सहास पर तनिक भी संदेह नहीं परन्तु.

अभिमन्यु: परन्तु क्या पिताश्री.

युधिष्ठिर: परन्तु, विपक्षी पक्ष में गुरु द्रौण, कर्ण और दुर्योधन जैसे महान योध्या है, जिनका सामना करने से स्वयं देवता भी डरते हैं.

अभिमन्यु: पिताश्री, ये सभी योध्या गत दिवस मेरे तीखे बाणों का स्वाद चख चुके हैं और मुझे पूर्ण विश्वास है में इन्हें आज भी अपने तीखे बाणों से परास्त कर सकता हूँ. और आप सभी भी तो होंगे मेरे साथ तो भयभीत होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं.

युधिष्ठिर: परंतु अभिमन्यु तुम्हे सिर्फ़ प्रवेश का मार्ग ज्ञात है और इस परिस्थिति में तुम्हारा चक्व्यूह में प्रवेश करना जोखिम भरा हो सकता है और अगर तुम्हे कुछ हो गया तो में अर्जुन को क्या जवाब दूंगा.

अभिमन्यु: उचित कहा पिताश्री मुझे सिर्फ प्रवेश का मार्ग ज्ञात है परन्तु पिताश्री आप शायद मेरी चिंता में इस बात को भूल गए की जिसके साथ गदाधारी भीम जिनकी गदा एक ही वार में बड़े से बड़े वीर को वीरगति दे देती है, नकुल और सहदेव जिनकी तलवारबाजी से स्वयं देवता भी डरते हैं और स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर जिनका भाला बड़े से बड़े शूरवीर को एक वार में मृत्यु के घाट उतर सकता है, उनके रहते मेरे साथ कैसे कोई अनहोनी हो सकती है.

युधिष्ठिर: परन्तु अभिमन्यु

अभिमन्यु: किन्तु, परन्तु जैसे शब्दों का इस युध्भूमि में कोई स्थान ही नहीं पिताश्री, अब कृप्या मुझे आज्ञा दीजिये चक्व्यूह में प्रवेश ही.

युधिष्ठिर: विजयीभवा: तुम आगे चलो हम तुम्हारे पीछे ही हैं.

अभिमन्यु: जी पिताश्री

युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर अभिमन्यु चक्रव्युह की पहली, दूसरी और आगे कई पंक्तियों को तोड़ता चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया.

नोट: यह वार्तालाप महाभारत से जुडी कहानियों से प्रेरणा लेता है, इसमें सभी समीकरणों को जोड़कर एक वार्तालाप के रूप में पेश करने की कोशिश की गई है. इस वार्तालाप का उदेश्य किसी वर्ग, संप्रदाय, राजनितिक दल, समाज के किसी भी वर्ग और व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ढेस पहुंचाना बिल्कुल भी नहीं है.

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