राधेय कर्ण

युद्धभूमि से कुछ दूर अपने एकदम शांत शिविर में कर्ण बहुत ही विचलित घूम रहे हैं, पिछले कुछ समय में हुई घटनाओं पर विचार करते हुए. गंगापुत्र भीष्म तीरों की शय्या पर हैं, गुरु द्रौन्ण वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं और कई वीर योद्धा इस युद्धभूमि की अग्नि में अपने जीवन की आहुति देकर इसे और भी ज़्यादा प्रज्जवलित कर चुके हैं. कई नई चुनोतियाँ सामने खड़ी हैं और अब सबकी आकांक्षाओं का भार राधेय कर्ण के कंधों पर सेनापति पद पर इस्तापित होने के बाद और भी अधिक हो गया है, परंतु राधेय कर्ण की चिंता का कारण ये सब नहीं कुछ और ही है. दिन-प्रतिदिन उन्हे अपने द्वारा दिए गये वचन, आशीर्वाद स्वरूप मिले श्राप रह रहकर परेशान कर रहे हैं.

कर्ण इन सब बातों पर विचार कर ही रहे थे की एक सैनिक ने आकर उन्हे सूचना दी.

सैनिक: सेनापति, महारानी कुंती आपके भेंट करने की अनुमति चाहती हैं.

कर्ण: है सैनिक माता को कभी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती, उन्हे सम्मान सहित अंदर आने दिया जाए.

सैनिक: जी सेनापति कर्ण.

सैनिक शिविर से चला जाता है और कर्ण फिर से अपने विचारों के सागर में डूब जाते हैं. महारानी कुंती शिविर में प्रवेश करती हैं और कर्ण को इस तरह गहरे विचारों में खोया देख वो कुछ नहीं कहतीं बस उसे यूँ ही देखती रहती है.

कर्ण: माता आपने इस वक़्त आने का कष्ट कैसे किया, कुछ विशेष बात है क्या.

कुंती: क्या एक माँ अपने पुत्र से अकारण नहीं मिल सकती.

कर्ण थोड़े तीखे स्वर में जवाब देते हैं ज़रूर आ सकती है, परंतु आप जब जब मुझसे मिलने आईं हैं, हर बार
उसके पीछे कुछ विशेष कारण ही होता है तो अब मैं ये कैसे मान सकता हूँ की आज आप मुझसे अकारण हीं
मिलने चली आईं.

कुंती: अपनी माँ पर इतना बड़ा आरोप मत लगाओ पुत्र, तुम मेरी दशा से परिचित नहीं हो.

कर्ण: भलीभांति परिचित हूँ माता, आपको हमेशा से अपने पुत्र से अधिक प्रिय अपना मान- सम्मान और प्रतिष्टा रही है. इसलिए अब इन व्यर्थ बातों में समय ना गवाएँ और मांगिए जो माँगना है.

वैसे अब मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं बचा, फिर भी मांगिए, यह राधेय कर्ण आपको रिक्त हाथों यहाँ से जाने नहीं देगा.

कुंती: में जानती हूँ पुत्र तुमने मुझे वचन दिया है की मेरे पाँचों पुत्र जीवित रहेंगे, परंतु में तुम दोनों (अर्जुन और कर्ण) में से किसी को भी खोना नहीं चाहती, किसी को भी खोना नहीं चाहती.

कर्ण: एक महारानी को यूँ अश्रु बहाना शोभा नहीं देता.

कुंती: परन्तु एक माँ तो अश्रु बहा सकती है.

कर्ण: ममता को भी इतनी लालसा शोभा नहीं देती, माता, यह युद्ध सिर्फ़ कौरवों और पांडवों के मध्य नहीं, वरन धर्म और अधर्म के बीच है और अगर कल भविष्‍य आपसे ये प्रश्न करेगा के है कुंती, माता गांधारी तो अपने ९९ पुत्रों को इस युद्धभूमि को दे चुकी हैं आपने इस युद्ध में अपने कोष से क्या दिया तो आप क्या उत्तर देंगी.

और में आप को भविष्य के सामने लज्जित खड़े नहीं देख सकता, इसलिए आपको अपना एक ना एक पुत्र इस युद्धभूमि को समर्पित करना ही होगा माता.

कुंती: परंतु पुत्र.

कर्ण: परंतु जैसे शब्दों का इस युद्धभूमि में कोई मूल्य नहीं रह गया है, इसलिए है माता में आपसे निवेदन करता हूँ की इन शब्दों का प्रयोग ना करे और मुझे कल के युद्ध की रणनीति पर विचार करने की आज्ञा दें.

यह राधेय कर्ण आपको हाथ जोड़कर प्रणाम करता है.

कुंती: यशाश्वि भव:

महारानी कुंती कर्ण को आशीर्वाद देकर शिविर से प्रस्थान कर जाती हैं और राधेय कर्ण फिर से अपने विचारों के सागार में लीन हो जाते हैं.

नोट: यह वार्तालाप पूर्णत: काल्पनिक हैं और इसका उदेश्य किसी वर्ग, संप्रदाय और व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ढेस पहुंचाना बिल्कुल भी नहीं है.

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