कन्फेशन

कहते हैं रिश्ते अगर सच की बुनियाद पर रखे जाए तो काफ़ी मजबूत होते हैं और जैसे-जैसे साल निकलते जाते हैं इन रिश्तों में प्यार, विश्वास और भी ज़्यादा गहरा होता जाता है. इसी सोच पर आधारित एक लघु कथा आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहा हूँ. आशा करता हूँ आप सभी को पसंद आए.

एक बड़े से महानगर से कुछ दूरी पर हरियाली और सुकून से भरे वातावरण में एक छोटा सा मकान है, डिज़ाइन कुछ ख़ास नहीं मगर देखने से प्रतीत होता है बड़े ही प्यार और मेहनत से खड़ा किया है इस मकान को. इसी मकान के किसी एकांत कोने में जहाँ किसी की नज़र बिना किसी प्रयास के ना जा सके यहाँ बैठे हैं हमारी कहानी के मुख्य पात्र मिस्टर गुप्ता जी, कद और काठी से होंगे तकरीबन ५ फुट और ३ इंच, रंग सावला और बेहद गंभीर मिज़ाज़ के. इस एकांत में गुलज़ार साहब की पुस्तक रावी पार को बड़ी ही तल्लीनता से पड़ने में व्यस्त हैं. पास ही एक टेबल पर बड़े ही सलीखे से एक प्याला चाय और कुछ बिस्किट एक प्लेट में रखे हुए हैं. देखकर ऐसा लगता है गुप्ता जी किताब में इतना खो गये हैं की उन्हे पता ही नहीं चला की चाय कब ठंडी हो गई. बीच-बीच में हल्की सी किसी पंछी के चहचहाहट की आवाज़ मीठा सा शोर पैदा करती है, मगर गुप्ता जी और किताब के बीच अंतराल देने में नाकामयाब हो जाती है.

तभी दूर से एक आवाज़ गुप्ता जी और किताब के बीच खलल पैदा कर जाती है.

निशा: पापा, पापा, मुझे पता है आपने अभी तक चाय नहीं पी होगी, इसलिए दूसरी लेकर आ रही हूँ.

गुप्ता जी: नहीं रहने दो बेटा, यही पी लूँगा.

निशा: बिल्कुल नहीं, मैने चाय बना ली है और में लेकर आ रही हूँ.

तभी एक छोटे-छोटे बालों वाली साँवली लड़की तकरीबन १९ वर्षीय अपने हाथों में चाय का कप लिए आ जाती है, गुप्ता जी और उनकी प्यारी किताब के बीच खलल डालने. ये हैं गुप्ता जी की सुपुत्री निशा. अभी-अभी स्कूल पास करके कॉलेज में दाखिला लिया हैं.

निशा: यह लीजिए आपकी चाय.

गुप्ता जी: बेटा इसकी क्या ज़रूरत थी, इसे ही गरम करके ला देती ना. कितना काम करती हो आप.

निशा: पापा आप भी ना बस, भला ठंडी चाय में आपको कैसे पीने देती.

थोड़ी देर निशा वही बैठी रहती है कुछ ख़यालों में खोई हुई, जैसे कुछ कहना चाहती है वो अपने पापा से, पर शब्द नहीं जुटा पा रही हो. गुप्ता जी अपनी बेटी के चेहरे के भावों को पड़ लेते हैं और उससे पूछते हैं.

गुप्ता जी: क्या हुआ बेटा, आप कुछ बोलना चाहते हो.

निशा: नहीं पापा, हाँ पापा.

गुप्ता जी: नहीं, हाँ, तुम ठीक तो हो ना बेटा. बोलो क्या बोलना है.

निशा: पापा आप नाराज़ तो नहीं होंगे ना, प्रॉमिस करो गुस्सा नहीं करोगे.

गुप्ता जी: पहले बताओ तो बेटा.

निशा: नहीं पहले आप प्रॉमिस कीजिए.

गुप्ता जी: ठीक़ है, प्रॉमिस. अब बोलो क्या बताना है.

निशा: वो मैने आपसे एक झूठ बोला है…

गुप्ता जी: कैसा झूठ

निशा: कल सुबह नास्ते की टेबल पर जब मुझे एक फोन आया था.

गुप्ता जी: हाँ तो, तुमने बताया ना तुम्हारी दोस्त रश्मि का फोन था.

निशा: नहीं पापा वो रश्मि ना नहीं मेरे दोस्त रोहन का फोन था.

गुप्ता जी: रोहन?

निशा: पापा रोहन मेरे साथ ही पड़ता है और कल हम सभी दोस्त घूमने गये थे, इसलिए उसने फोन किया था.

गुप्ता जी के चेहरे को देखकर लगता है वो बहुत गुस्सा हैं मगर अपने भावों को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं. एक अजीब सी ख़ामोशी उस पहले से ही एकांत में जैसे फैल गई. गुप्ता जी कुछ नहीं बोल रहे थे और निशा की कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. फिर भी वो हिम्मत करके कुछ बोलने की कोशिश करती है.

निशा: पापा आप कुछ बोलते क्यूँ नहीं.

गुप्ता जी थोड़े तीखे स्वर में: अब यह सब बताने का क्या मतलब, आपको अपने मन की करनी थी करली.

निशा: पापा, जब से झूठ बोला है, कुछ ठीक नहीं लग रहा है, बहुत बुरा लग रहा है.

इतना बोलकर निशा की आँखों से कुछ आँसू झलक जाते हैं, अपनी बेटी की आँखों में आँसू देखकर गुप्ता जी भी भावुक हो जाते हैं और थोड़ा सा मुस्कुरा कर बोलते हैं.

गुप्ता जी: इस बार ठीक हैं पर अगली बार किसी रोहन या रश्मि के साथ बाहर जाना हो तो पहले से बता देना. ठीक है.

निशा के चेहरे पर एक मुस्कान बिखर जाती है, और वो बहुत ही हल्का और अच्छा महसूस कर रही है. वो उठकर अपने पापा के गले लग जाती है और रुआंसी सी आवाज़ में बोलती है.

निशा: थॅंकयू पापा, अब में आपसे कभी झूठ नहीं बोलूँगी

गुप्ता जी: पक्का

निशा: प्रॉमिस.

किसी ने ठीक ही कहा है बहुत सुकून मिलता है सच बोलकर.

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