अभिमन्यु

अभिमन्यु की उत्तरा के साथ युद्धभूमि में जाने से पूर्व हुई वार्तालाप को एक काल्पनिक रूप देकर आपके सामने इसी आशा के साथ रख रहा हूँ की आपको पसंद आए, तो पढ़िए और अपने सुझाव दें, शायद अगली बार कुछ इससे भी और बेहतर कथा प्रस्तुत कर सकूँ.

युद्धभूमि के प्रचंड शोर, धनुष की टंकार और घोड़ों के टापुओं के तीव्र स्वरों के बीच भी एक जगह है जहाँ एक अद्भुत शांति ने अपना वर्चस्व कायम करके रखा है. उत्तरा और अभिमन्यु का शिविर, जहाँ ना सिर्फ़ असीम शांति है अपितु एक अजीब सा शोर भी है. ये युद्धभूमि से उठने वाला शोर नहीं वरन विचारों और भावनाओं का शोर है वो उत्तरा को घेरे हुऐ है.

सत्रह वर्ष की सुंदर छवि वाली उत्तरा अपने मन में उठने वाले ना जाने कितने तूफ़ानों को अपने चेहरे के भावों में बिल्कुल प्रकट होने नहीं दे रही है. तभी एक और से अभिमन्यु प्रवेश करता है और थोड़ी देर बिना कुछ कहे उत्तरा के मुख के भावों को पड़ने की कोशिश करता है, और जब नाकामयाब हो जाता है तो पूछ ही लेता है.

अभिमन्यु: लगता है किसी गहन चिंतन में हो, तभी मेरे आने की आहट भी नहीं सुनी तुमने.

उत्तरा: आर्य आप कब आए.

अभिमन्यु: अभी कुछ समय पूर्व ही, अब बताओ किन विचारों में उलझी हो.

उत्तरा: कुछ ठीक नहीं लग रहा है आर्य, अजीब-अजीब से ख़याल मन को अशांत कर रहे हैं, कुछ तो बुरा होने वाला है ऐसा आभास हो रहा है.

अभिमन्यु: ये युध्भूमि है उत्तरा, प्रतिदिन कुछ ना कुछ होता ही है यहाँ.

उत्तरा: पर आर्य, आज मन कुछ ज़्यादा ही विचलित है.

अभिमन्यु: शायद इसलिये क्यूंकी आज इस रणभूमि का सबसे निर्णायक युद्ध होगा.

उत्तरा: आर्य, निर्णायक युद्ध.

अभिमन्यु: हाँ उत्तरा, आज युद्धभूमि में गुरु द्रौन्‍ण ने चक्रव्यूह रचा है.

उत्तरा: चक्रव्यूह को कैसे तहस-नहस करना है, ये तो पिता श्री और श्री कृष्ण भली-भाती जानते हैं.

अभिमन्यु: हाँ, परंतु, आज पिता श्री और श्री कृष्ण किसी और प्रयोजन से युद्धभूमि से कोसो दूर हैं, और आज युद्ध का सारा भार मेरे कंधों पर है क्यूंकी मेरे अतिरिक्त किसी और को चक्रव्यूह भेदन के बारे में ज्ञात नहीं.

चिंता की लकीरें उत्तरा के मुख पर साफ़ दिखाई दे रही हैं, उत्तरा कुछ बोलना चाहती है परंतु शब्द उसका साथ नहीं दे रहे हैं. अभिमन्यु भी शांत है. कुछ देर के विराम के बाद उत्तरा कुछ बोलती है.

उत्तरा: परंतु स्वामी आप तो सिर्फ़ चक्रव्यूह में प्रवेश करना जानते हैं, बाहर निकलने का मार्ग तो आपको ज्ञात ही नहीं. ऐसी स्थिति में आपको जाने नहीं दे सकती.

अभिमन्यु: नहीं उत्तरा, मुझे जाना होगा. क्या तुम ये चाहती हो की तुम्हारे अभिमन्यु को आने वाली सदी एक कायर के रूप में याद करे. उसपर ये आरोप लगाए की अपने प्यार से मजबूर होकर अभिमन्यु अपने कर्तव्य का पालन करने से चूक गया.

उत्तरा: नहीं आर्य.

अभिमन्यु: तो फिर मुझे जाने दो, मुझे अपने प्यार से कमजोर मत करो. मुझे जाने दो उस युद्धभूमि में जहाँ आकाश धूमिल है इतना की सूरज की लालिमा को धरती तक आने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. जहाँ हवाओं में नमी है सिर्फ़ आसुओं के नमकीन जल की. जहाँ हज़ारों शवों के ढ़ेर लगे हुए हैं, रक्त से नहाए हुए. उसी युद्धभूमि में आज मुझे अपने कौशल और साहस का परचम लहराना है.

यह सब सुनकर उत्तरा के मुख पर गंभीर भाव उतर आते हैं, आँखों में आसुओं की धारा किसी भी समय बहने के लिए तैयार है और मुख की लालिमा गायब हो गई है. कुछ पल दोनों यूँ ही शांत मुद्रा में खड़े, एक दूसरे के भावों को पड़ने की कोशिश करते हैं. फिर कुछ सोचकर उत्तरा बोलती है.

उत्तरा: में आपकी सहधर्मिणी हूँ, जो आपका धर्म है वो मेरा धर्म है, और अभी आपका धर्म सिर्फ़ युद्ध करना हैं और में आपके इस धर्म में किसी तरह की बाधा नहीं बनना चाहती. में आपकी अर्धशक्ति हूँ और अगर आपके हर युद्ध में आपके साथ हूँ और कैसे में इस महान धनुर्धर को अपने कर्तव्यपालन से रोक सकती हूँ… कैसे उसे अपने प्रेम की डोर से बाँध सकती हूँ.

आप जाईये आर्य और ऐसा युद्ध कीजिये जैसा आज तक किसी ने ना किया हो… और ना ही आगे कोई कर पाए. ऐसा युद्ध जिसे सदियों तक याद रखा जाये और आपको भी… जाइये आर्य, जाइये युद्धभूमि आपका इंतज़ार कर रही है…

कुछ पल दोनों शांत खड़े एक दूसरे की निगाहों में देखते रहते हैं, दोनों को पता है, भविष्य उनके लिए क्या सौगात लेकर आने वाला है, फिर भी यही प्रार्थना कर रहे हैं की सब कुछ उचित हो.

कुछ देर ऐसे ही रुककर अभिमन्यु युद्धभूमि की और प्रस्थान करता है, उत्तरा वहीं खड़े अभिमन्यु को यूँही देखते रहती है जब तक वो उसकी आँखों से ओझल नहीं हो जाता.

समाप्त या यूँ कहिए एक नये अध्याय की शुरूवात.

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