में भी जीना चाहती हूँ.

नारी जिसने कदम-कदम पर कभी माँ, कभी पत्नी, कभी बहन, कभी भाभी, तो कभी एक ज्वाला के रूप में अपने सपनो का बलिदान देकर परिवार और अपनों को खुशियाँ दी हैं. वही प्यार, त्याग और ममता की मूरत आज अपने जीवन के लिए संघर्षरत है. उसे शिकार होना पड़ रहा है पिछड़ी सोच का. वह समाज जो लड़की को लक्ष्मी के रूप में पूजता तो हैं मगर उसके पैदा होने पर खुशियाँ नहीं मानता. वही लक्ष्मी आज अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही है. आज भी कई परिवारों में लड़की को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है. यह सोच आज बहुत ही विकराल रूप ले चुकी है और दिन-ब-दिन कन्या शिशु हत्या का अनुपात बढता ही जा रहा है जिसके परिणामस्वरुप लड़कियों की संख्या लगातार कम हो रही है.

आखिर यह समाज इस बात को क्योँ नहीं समझता चाहता की, वो भी एक जीवन है, उसे भी जीने का अधिकार है, उसके भी कुछ सपने है, जिन्हें वो पूरा करना चाहती है, जन्म लेना चाहती है. आज आपके सामने इसी समस्या से जुडी चार पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमे एक लड़की अपने मन की बात बता रही है की आखिर वो जन्म क्योँ लेना चाहती है.

में भी जीना चाहती हूँ.

में भी जीना चाहती हूँ, जन्म लेना चाहती हूँ…
खुले आकाश तले अपने अरमानो को सच होते देखना चाहती हूँ…
कभी पंछियों की तरह चहचहाना, तो कभी पतंग की तरह लहराना चाहती हूँ…
कभी इठलाती नदिया की तरह बहना, तो कभी साहिल की तरह थमना चाहती हूँ…
में भी जीना चाहती हूँ, जन्म लेना चाहती हूँ.

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