नारी का गौरव

एक बार फिर बिछी है चौसड़
लगा है दाव
मुक्बधिरों और अंधों के शवों से सजा है ये गाँव

फिर उछला पासा शकुनी के हाथ से
फिर गए सत्ता और सती
युधिष्ठिर की बात पे

दुर्योधन के हुकम पे लाई गए द्रौपदी भरे दरबार में
खीचा आँचल, लुट गई नारी

कोई अँधा बनकर तो कोई प्रतिज्ञा से बंधकर सर झुकाए बैठा है
नहीं बना कोई इसका रखवाला

नीलाम होती रही, वो भरे दरबार में
कुछ निगाहें उसे देख हँसती रही, तो कुछ शर्म से तपती रही

नहीं उठा कोई हिम्मतवाला, ना बना उसका कोई रखवाला
जब तक आया था वो उपरवाला

उठ अब, बन तू दुर्गा, कर दे कलम
दुर्गा तेरे रूप अनंत
भूली है हनुमान की तरह तू भी अपनी ताकात
याद अब तुझे वो जायेगी

हर नारी का गौरव, अब तू ही बचायेगीतू ही बचायेगी.

 

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