मिट्टी के सपने.

सुबह के तकरीबन ६ बज रहे थे. मौसम में थोड़ी नमी थी और हवा भी हलके हलके बह रही थी. गाँव की एक छोटी सी झोपडी के एक कोने में मिट्टी के बिछोने पर शुभा दुनिया से बेख़बर मिट्टी के सपनों में खोई हुई थी. शुभा कहने को तो सिर्फ़ १३ साल की है मगर बातों और समझदारी में किसी बड़ी उम्रवालों से कम नहीं है. रंगबिरंगे सपने देखना और उन सपनों के लिए जी तोड़ मेहनत करना, सिर्फ़ यही सीखा है उसने. अपनी मेहनत और सच्ची लगन की बदौलत ही उसने पिछले साल १० कक्षा के बोर्ड एग्जाम में पूरे जिले में टॉप किया था. इतना ही नहीं उसकी इस उपलब्धि पर कलेक्टर द्वारा उसे वार्षिक उत्सव के दौरान सम्मानित भी किया गया था. शुभा आज भी रंगबिरंगे सपनों में खोई हुई है तभी उसके रंगबिरंगे सपनों में एक ख़राश भरी आवाज़ खलल पैदा कर देती है. भीखू कुम्हार शुभा के पिता, बड़े ही प्यार से शुभा को उठाने की कोशिश कर रहे हैं.

उठ जा बेटा, आज बहुत सारे खिलोने बनाने हैं.

भीखू कुम्हार का एक छोटा सा परिवार है. कुल मिलाकर ५ सदस्य हैं परिवार में, भीखू, उसकी पत्नी, शुभा और उसके बूढ़े माता-पिता. भीखू कुम्हार मिट्टी के खिलोनें, मटके और दिये वगेरह बनाकर अपना पूरा परिवार पालता है. पर पिछले कुछ सालों में प्लास्टिक के खिलोनें और चीनी मिट्टी के दीयों का प्रचलन बड़ने से भीखू कुम्हार का व्यापार कुछ थम सा गया है. जहाँ वो महीनेभर में ८-१० हज़ार के खिलोनें, दिये और मटके बेच दिया करते थे, वो अब गिरकर सिर्फ़ ३ हज़ार रूपए रह गए हैं और इतने कम रुपये में पूरे घर का ख़र्च चलाना बहुत मुश्किल हो चला है और कुछ दिनों से माँ की तबियत भी बिगड़ने लगी थी. और रही सही कसर गाँव के सबसे बड़े साहूकार ने गाँव में खिलोनों की दूकान खोलकर पूरी कर दी थी, जहाँ कई तरह के खिलोनें थे जैसे चाबी घुमाने पर करतब दिखाता बन्दर, उड़ने वाला प्लेन, सरपट दौडती कार और ना जाने क्या-क्या. ऐसे में भीखू कुम्हार के खिलोनें कौन ख़रीदता, अब तो जो इनकम ३ हज़ार थी, वो भी आधी रह गई थी. फिर भी भीखू कुम्हार ने हार नहीं मानी थी, वो आज भी उसी लगन से खिलोनें बनाता और सारे गाँव में घूम-घूमकर खिलोनें बेचने की कोशिश करता. और उसकी हर कोशिश में उसके साथ होती शुभा, उसकी नन्ही परी.

शुभा आज भी हमेशा की तरह उठकर खिलोनें बनाने में भीखू की मदद करती है, फिर खिलोनों पर रंग लगाती है, उन्हें सूखने के लिए एक कोने में रख देती और फिर सूखे खिलोंनों और दीयों को अलग रखकर बेचने के लिए तैयार कर देती. इस बीच दोनों बाप-बेटी बहुत मस्ती करते, हंसी के ठहाके पूरे आंगन में गूंज जाते, मगर आज उसके पिता जो हमेशा उसके साथ हस्ते और खेलते थे आज बहुत देर से चुप थे और उसकी इस चुप्पी को बहुत देर से पड़ रही थी शुभा. उसे इस चुप्पी और ख़ामोशी का मतलब शायद समझ आ गया था, इसीलिए वो अपने बाबा का थोडा ध्यान बाटने की कोशिश करती है.

देखो बाबा, मैंने रंग कर दिया है इन खिलोनों पर. देखो ये राजकुमारी कैसी लग रही है.

भीखू बड़े ही प्यार से शुभा की तरफ देखकर बोलता है.

सुन्दर, बिल्कुल मेरी नन्ही परी जैसी.

इतना बोलकर भीखू फिर से चक्के के पास बैठ फिर से गहरी सोच में खो जाता है.

शुभा जो बहुत देर से अपने पिता का ध्यान बाटने की कोशिश कर रही थी, अपनी कोशिशों को नाकामयाब होते देख थोड़ी मायूस ज़रूर होती है मगर उसे पता है अपने पिता को हँसाने के लिए क्या करना है.

शुभा चुपके से भीखू के पास जाती है और गुदगुदी करती है, इस तरह अचानक से शुभा के गुदगुदी करने से भीखू हसने लगता है और साथ में शुभा भी खिलखिला कर हसने लगती है. भीखू अपनी नन्ही सी परी शुभा को गले लगा लेता है. थोड़ी देर बाद दोनों तैयार खिलोनों को टोकरी में रखते हैं और भीखू टोकरी लेकर गाँव में बेचने के लिए निकल जाता है और शुभा स्कूल जाने के लिए तेयारी करने लगती है.

दिनभर भीखू कड़ी धूप में घर-घर जाकर खिलोनें बेचने की फिर से एक नाकामयाब कोशिश करता है और जब कुछ ज्यादा खिलोने नहीं बिकते तो थकहारकर तकरीबन ४ बजे घर वापस आ जाता है. रोज की तरह भीखू कुछ वक़्त अपने बूढ़े माता-पिता के पास बैठता है और फिर अपनी पत्नी के साथ खाना खाकर आराम करने चला जाता है.

शुभा स्कूल से वापस आकर सबसे पहले अपना बस्ता एक कोने में रखकर रोज की तरह अपने पिता भीखू के पास जाकर बैठ जाती है और दिन-भर उसने क्या-क्या किया पूरे विस्तार से बताती है और उसके पिता ने क्या-क्या किया बड़े ही प्यार से पूछती है. उस सुहानी शाम में भी वो वही सुबह वाली चुप्पी अपनी पिता ही आँखों में पढ़ पा रही थी. उसने कोशिश बहुत की की आखिर जाने वजह क्या है, पर जब नाकामयाब रही तो वो चुपचाप अपने पिता के पास ही बैठी रही और सुनती रही उनकी ख़ामोशी और पढ़ती रही उनकी आँखों की मायूसी. उसकी उम्र के बच्चों को शायद समझ ना आये मगर उसे समझ आ गई थी वजह उसके पिता की ख़ामोशी और मायूसी.

उस पूरी शाम वो यही सोचती रही की आखिर ऐसा क्या किया जाए की उसके पिता के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान बिखर जाए, या फिर कुछ ऐसा किया जाए की उसके पिता की परेशानियों कम हो जाए. आखिरकार उसके छोटे से दिमाग ने एक बड़ी तरकीब निकाल ही ली थी. उसने सोचा आने वाले त्यौहार में वो लोग भी मिट्टी की मूर्तियाँ बनाकर बेचें. वैसे भी उसके गाँव के लोग शहर जाकर कई त्यौहार जैसे गणेश उत्सव, नवरात्री, दिवाली के लिए मूर्तियाँ लाते ही हैं. अगर गाँव में ही मूर्तियाँ मिल जाये तो फिर कोई बहार क्यूँ जाये. उसे लगा शायद उसकी यह तरकीब काम कर जाए इसलिए वो जल्दी से खाना खाकर अपना होमवर्क छोड़ यही सोचने लगी कब सब घरवाले सोयें और वो मूर्ति बनाये. उसका हाथ इतना साफ़ तो नहीं था मूर्तियाँ बनाने में मगर खिलोने बनाते बनाते और अपने पिता के साथ उनपर रंग और सफाई का काम करते करते उसे इतना तो अनुभव हो ही गया था के कैसे मूर्तियाँ बनाते और उनको कैसे रूप देना है.

और जब उसने देखा सभी घरवाले गहरी नींद में है तो वो चुपके से उठी और आँगन में जाकर गणेश जी की मूर्ति बनाने की कोशिश करने लगी. पहले-पहल उसकी कुछ कोशिशें नाकामयाब रही. कभी किसी मूर्ति की सूंड बड़ी हो जाती तो कभी किसी मूर्ति का एक कान छोटा तो दूसरा बड़ा हो जाता. कभी पेट बराबर नहीं बनता तो कभी किसी के पैर. पर शुभा ने सोच लिया था उसे मूर्ति बनानी ही है इसलिए हार ना मानते हुए वो लगी रही और आखिरकार कुछ १०-१२ कोशिशों के बाद एक मूर्ति ऐसी बनी जो हर तरह से पूर्ण थी, बस उस पर रंग करना बाकी था. रंग करने में तो वो वैसे भी माहिर थी, इसलिए बिना कोई वक़्त गवाए उसने मूर्ति को रंग किया और सूखने के लिए ऐसी जगह रखा जहाँ किसी की नज़र ना पड़े और फिर चुपचाप अपने चेहरे पर एक विजयी मुस्कान लिए अपनी माँ के पास जाकर सो गई.

अगली सुबह जब वो उठी तो उसने हमेशा की तरह उसके पिता को खिलोने और दिए बनाते हुए पाया. वो चुपके से उसके पिता का पास गए और तेज आवाज़ में बोली…

बाबा…

भीखू इस तरह अपने नाम के संबोधन से थोडा सा चोके और फिर एक हलकी सी मुस्कान के साथ अपनी पारी को गले लगा लिया. शुभा वैसे ही थोड़ी देर अपने पिता की गोद में रही और फिर बोली.

बाबा मेरे पास ना आपके लिए कुछ ख़ास बनाया है.

भीखू से थोड़े आश्चर्य से पूछा – ख़ास, क्या बनाया है बताओ तो जरा.

शुभा ने बड़े ही भोलेपन से कहाँ, ऐसे नहीं बाबा, पहले आपको अपनी आँखें बंद करनी होगी फिर ही बताउंगी.

भीखू बड़े ही प्यार से बोलता है – अच्छा चलो में आँखें बंद करता हूँ, अब चलो बताओ क्या ख़ास बनाया है.

ऐसे ही रहना बाबा, आखें मत खोलना, में अभी लेकर आई.

भीखू वैसे ही आखें बंद किये शुभा के आने का इंतज़ार करने लगता है.

शुभा भागते हुए जाती है वो गणेशजी की मूर्ति को भागते हुए लेकर आती है और बड़े ही प्यार से भीखू के हाथों में रखकर बोलती है.

बाबा अब धीरे-धीरे आँखें खोलो.

भीखू धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलता है और देखता है अपने हाथों में गणेश की एक बेहद ही ख़ूबसूरत मूर्ति. जिससे देखकर उसकी आखों से आसूं झलक जाते है. वो रुआंसे से गले से बोलता है.

ये आपने बनाई है मेरी परी.

शुभा बड़े ही भोलेपन से बोलती है:  हाँ बाबा, यह मैंने आपके लिए बनाई है और आपको पता है मैंने यह क्यूँ बने है.

भीखू शुभा के प्रशन को समझ ही नहीं पता है इसलिए शुभा से पूछता है. क्यूँ बनाई है बेटा.

शुभा अपने पिता के प्रशन का उत्तर बड़े ही भोले अंदाज़ में देती है.

आप ना बाबा बहुत परेशान रहते हो ना, क्यूंकि हमारे बनाए हुए खिलोने नहीं बिकते ना. सब गाँव वाले उस साहूकार की बड़ी दूकान पर चलते जाते हैं. तो मैंने सोचा क्यूँ ना बाबा हम भगवान की मूर्तियाँ बनाए. वैसे भी जा सारे गाँव वाले शहर जाकर भगवान की मूर्तियाँ लाते हैं. अगर हम गाँव में ही बना लेंगे तो वो सब फिर हमसे ही खरीदेंगे ना.

मेरी परी, आपने इतना सब मेरे लिए सोचा.

शुभा बड़े ही भोले अंदाज़ में बोलती है.

आप परेशान रहते हो ना, वो मुझे अच्छा नहीं लगता. अब आप खुश हो जाओ.

यह सुनकर भीखू की आँख़ें से आंसू झलक जाते है और वो शुभा को गले से लगा लेता है. शुभा जो भीखू को समझाना चाह रही थी वो समझ गया है. उसे समझ आ गया है के उसकी परेशानियों का अंत कैसे होगा, कैसे वो दिन-ब-दिन मर रहे उसके सपनों को आकर दे सकता है. कैसे वो मिट्टी के सारे सपने मिट्टी से ही साकार कर सकता है.

समाप्त.

चुन्नू

वो मुस्कुराता चेहरा, कई सारे ख्व़ाब, कई ख़्वाहिशें, कई हसरतें और कई अरमान. कैसा हो अगर उन सभी ख्वाहिशों और अरमानों को कुछ चुनिंदा लम्हे ज़ज्बे और होंसलों के रंगों से उस मुस्कुराते चेहरे पर बसी दो प्यारी आँखों में भर दे. कैसा हो अगर सिर्फ एक पल उसकी सारी दुनिया बदल दे. कैसा हो अगर सिर्फ़ एक पल उसे इतनी हिम्मत दे दे की वो मुश्किल हालातों से लड़ने को तैयार हो. सोचने या बोलने में शायद नामुमकिन सा लगता है पर है तो सच. सिर्फ एक लम्हा ही काफ़ी होता है किसी को उर्जा से भरने के लिए जो उसे सफलता की ऊँचाइयों पर ला खड़ा कर सकती है. कुछ ऐसा ही हुआ है हमारे कहानी के किरदार चुन्नू के साथ.

चुन्नू जो हमेशा की तरह अपने ख़्वाबों के इन्द्रधनुषी संसार में कई रंग के सपने और हर सपने से जुड़े संसार में खोया है, उसी चाय की टपरी के कोने में जहाँ वो काम करता है. इसी तरह वो घंटों-घंटों बैठा रहता है उसी कोने में जब तक की चाय टपरी के मालिक नन्दूराम का तगड़ा हाथ उसकी पीठ पर अपने निशा नहीं छोड़ जाता. आज भी नन्दूराम का तगड़ा हाथ चुन्नू की पीठ पर और उसकी ख़राश भरी आवाज़ चुन्नू से साथ पडता है और ला खड़ा कर देता है उसे, असल दुनिया में.

साले चुन्नू, शेख़-चिल्ली उठ और ऑफिस नंबर १०५ में ये चार चाय सक्सेना साहब के केबिन में लेकर जा. दिन-भर जा जाने किस उधेड़बुन और ख़्वाबों की रंगीन दुनिया में खोया रहता है. साले कुछ काम करेगा तो, खाने को कुछ मिलेगा. ख़्वाबों से किसी का पेट नहीं भरता. जा अब जल्दी से चल देकर आ. और सुन हमेशा की तरह वही मत रुक जाना.

चुन्नू वही खड़े सब चुपचाप सुनता रहा और कुछ देर बार एक हाथ में चाय का ट्रे और दूसरे हाथ से अपनी पीठ मलता चुन्नू निकल पडता है ऑफिस नंबर ५०१ की तरफ. वैसे चाय टपरी से ऑफिस का रास्ता है तो सिर्फ़ ५ मिनट का मगर चुन्नू ये रास्ता तकरीबन १० मिनट में तय करता है. इस छोटे से सफ़र में वो कई कीर्तिमान रच चुका होता है, कई पुरूस्कार अर्जित कर इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा चुका होता है, कई असंभव से लगने वाले लक्ष्य अपनी कड़ी मेहनत से हासिल कर चुका होता है. आज भी उसने कुछ ऐसा ही किया और छोटे-छोटे क़दमों से अपने ख़्वाबों के पुलों को पार करता पहुँच जाता है सक्सेना साहब के केबिन तक.

सक्सेना साहब का केबिन जहाँ हंसी और एक खुशनुमा माहौल रहता है आज कुछ ज्यादा ही गंभीर था. चुन्नू को लगा शायद किसी गंभीर टॉपिक पर बहस छिड़ी हुई है, इसलिए वो थोडा सा सहमा हुआ सा, केबिन में दाखिल होता है. बिना किसी आवाज़ के और किसी के काम में दखल डाले, चाय के गिलास वहां बैठे चार लोगों के सामने रखकर, चुपचाप से एक कोने में खड़ा हो जाता है. सभी उसे एक नज़र देखकर नज़रंदाज़ करते हुए अपने काम में मशगुल हो जाते हैं. चुन्नू अक्सर ऐसे कई प्रेजेंटेशन में हिस्सा ले चूका है, इसलिए किसी को भी उसके वहां होने से किसी तरह का डिस्टर्बेंस नहीं होता है. चुन्नू जब भी चाय देने आता है तो कोई न कोई प्रेजेंटेशन या बहस छिड़ी ही रहती है और उसे वो बहस और प्रेजेंटेशन बड़े ही रोचक और प्रेरणादायक लगते हैं इसीलिए वो अक्सर सब कुछ भूलकर उन्ही प्रेजेंटेशन में खो जाता है.

आज भी वो अपने पसंदीदा कोने में जहाँ हमेशा वो खड़ा रहता है, खड़ा है और इसकी नज़र केबिन के कोने में टंगी एलइडी पर है. एलइडी पर आज हमेशा की तरह कोई प्रेजेंटेशन नहीं चल रहा था, कोई मूवी थी शायद. चुन्नू को ऐसा लगा मानों जैसे आज सभी का मूड लाइट है इसलिए कोई मूवी देख रहे होंगे. पर वहां बैठे सभी के चेहरों पर तो अजीब से लकीरें खिची हुई थी, जिसे देखकर लग रहा था जैसे बहुत ही गंभीर डिस्कशन है या फिर किसी तरह की तैयारी. उनके चहेरों की लकीरों को पढकर समझना थोडा मुश्किल था इसलिए चुन्नू ने अपना सारा ध्यान एलइडी पर लगा दिया. एलइडी पर किसी फिल्म के कुछ द्रश्य चल रहे थे, जिन्हें बड़ी ही ख़ूबसूरती से एक प्रेजेंटेशन का रूप दिया गया था.

सक्सेना साहब एलइडी के सामने खड़े होकर कुछ बोल रहे थे, चुन्नू को सब-कुछ तो समझ नहीं आ रहा था पर वो इतना जरूर समझ गया था. जो कुछ भी सक्सेना साहब बोल रहे थे वो जरूर वहां बैठे लोगो को जोश से भरना और आने वाले कॉर्पोरेट चैलेंज के लिए तैयार करना है और शायद यही बात सक्सेना साहब उस फिल्म की क्लिप के ज़रिये बताने को कोशिश में हैं जिसमे नायक बोल और सुन नहीं सकता है, फिर भी उसने एक सपना अपनी आँखों में बसा लिया है, जो दुनिया की नज़र में उसके लिए पूरा होना लगभग नामुमकिन है. लोग हज़ार कोशिश करते हैं उससे वो सपना छीनने की. कई अडचने आती हैं, लोग उसकी प्रतिभा पर उँगलियाँ उठाते हैं. पूरी कोशिश करते हैं उसे नीचा दिखाने की. पर इक़बाल अपने इरादों का पक्का है, उनसे ठान लिया है, उसे अपने ख़्वाबों को साकार करना है. वो दिन रात मेहनत करता है. दुनिया से लड़ता है, हर उस इंसान को अपनी कड़ी मेहनत से अपने ख्व़ाब को सच कर करारा जवाब देता है जिसने कभी जाने, तो कभी अनजाने उसके ख़्वाबों को बेवकूफी का नाम दिया था.

वहां क्लिप में फिल्म का नायक अपने लक्ष्य को हासिल करता है और यहाँ सक्सेना साहब अपने लक्ष्य को. केबिन में बैठे सभी लोगों के चेहरे का रंग बदल चुका है, सभी उत्साहित और एक नयी उर्जा से भरे नज़र आ रहे हैं, उनके चेहरे की लकीरों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है मानों सक्सेना साहब अपने लक्ष्य को हासिल कर चुके हैं.

इधर एक कोने में खड़ा चुन्नू यह सबकुछ बड़े ही ध्यान से सुन और देख रहा है, उसके अन्दर एक ऐसा सैलाब उठा है जिसे अब रोक पाना मुश्किल है, कुछ नए ख्व़ाब आकर ले चुके हैं. आज उसे सफलता का गुरुमंत मिल गया है, उसे समझ आ गया है की सिर्फ़ ख्व़ाब देखना ही काफी नहीं. हर ख्व़ाब को हकीकत में बदलने के लिए कड़ी मेहनत और दिन-रात प्रयास करने होते हैं. और उसके लिए दिल में एक शमा जलानी पड़ती हैं जो संशय और संदेह के वक़्त में आपके होंसलों को रोशन करता है. सक्सेना साहब और अन्य लोग इस बात से अनजान थे मगर उन्होंने आज चुन्नू के दिल में ख़्वाबों की वो शमा जला दी है.

चुन्नू वहीँ कुछ देर और वैसे ही खड़ा रहता है और फिर चाय के गिलास ट्रे में रखकर वहां से निकल जाता है. अब वो वही चुन्नू नहीं जो सिर्फ़ ख्व़ाब देखना जानता था, अब उसे पता है कैसे उसे अपने ख़्वाबों को हकीकत में बदलना है, कैसे इस दुनिया में अपनी जगह बनानी है. कैसे अपनी बेरंग दुनिया को ख़्वाबों के रंगों से भरना है.

समाप्त.

कुछ ख़याल

हिचकियों ने अब साथ छोड़ दिया है मेरा
लगता है तू आज कल मुझे याद नहीं करता.

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जब हम अमीर थे,
तुम हमारे करीब थे.

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घर की मुंडेर पर आज
एक कोवा नज़र आया
शायद कोई आने वाला है.

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कभी कोशिश ही नहीं की उसने अपने
हाथों की लकीरों को पड़ने की
कुछ लकीरें उसमे मेरे नाम की भी थी.

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अजीब दौलत है तेरे इश्क की
जितना भी ख़र्च करो उतनी ही बढती जाती है.

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तुम्हे ही लिखता हूँ में हर अलफ़ाज़ में
वरना नहीं कुछ मायने मेरे और
मेरे अल्फाज़ों के तुम्हारे बिना.

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लोगो का वक़्त आता है,
मेरा एक पूरा दौर होगा.

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कुछ ख़याल

बड़े दिनों बाद आज आई है उन्हें याद हमारी
वरना हम ही थे जो फ़ुर्सत से उनकी यादों को
दिल से लगाए बैठे रहते थे.

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कहीं ना कहीं कोई तो ऐसा होगा जो
मुझे खोने से डरता होगा.

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चाहे कितने भी आईने रख दो उनके सामने
पर सच्चाई तो उनकी आँखों में ही नज़र आती है.

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कुछ और पल रुका था वो आज मेरे पास
शायद उसे भी मेरा साथ अब अच्छा लगने लगा है.

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दिल से कोशिश की थी मैने उसे मानने की
और उसने कोशिश की थी मेरी
हर कोशिश को आज़माने की.

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शब्द तो बहुत है मेरे शब्दकोश में
पर तुम्हारे दिल तक पहुंच सके ऐसे शब्द कम हैं.

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उलझे रहे ज़िंदगी के सवालों में सारी उम्र
सुलझे भी तो उस एक पल में.

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चलो फिर से मिलकर कुछ सुकून भरे पल  ढूंढते  है
शायद इस बार हमारी कोशिशें काम कर जाएँ.

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बस अब इतनी सी रह गई है ये कहानी
एक था वो और एक थे हम.

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फिर से लौट आया है
वही  जाना-पहचाना दर्द
पल पल बढ़ती बेचैनी
और
हर सुकून भरी नींद के साथ
बढ़ता ख्वाहिशों का बोझ.

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फिर से रहने लगा है मेरे कमरे में वही अँधेरा
जो कभी थोडा तेरा था तो और कभी थोडा मेरा.

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मुलाकाते ट्रेन

एग्जाम ख़तम हुए दो दिन हो चुके थे, मगर एग्ज़ाम का हैंगओवर अभी तक उतरा नहीं था आशीष के सर से, पूरे कमरे में यहाँ वहाँ किताबें, नोट्स और चाय के कप बिखरे हुए थे, कुल मिलाकर एक बैचलर के कमरे का जो हाल होता हैं वैसा ही कुछ हाल उस समय आशीष के कमरे का था. सुबह के ग्यारह बज चुके थे पर आशीष के लिए अभी सुबह नहीं हुई थी, बड़े ही आराम से आशीष अपने बेड, जिस के एक और किताबें और दूसरी और बहुत सारे कपड़े फैले थे, बेफ़िक अपने ख़्वाबों के संसार में खोया था, इस बात से बेख़बर के दोपहर दो बजे जो ट्रेन उसे पकड़नी है वो एक बहुत ही खूबसूरत ख़्वाब की सौगात लेकर आने वाली है. वैसे भी ये उम्र होती ही ऐसी ही, अपने ही ख़्वाबों की दुनिया में खोये रहते हैं हर पल. आशीष भी कुछ ऐसी ही ख़्वाबों की दुनिया में खोया हुआ था पर उसके ख़्वाबों में जल्द ही दखल दे दिया अलार्म क्लॉक की कर्कश ध्वनि ने और ला खड़ा किया उसे असली दुनिया में. अपनी आँखों को मलते-मलते जैसे-तैसे उसने अलार्म क्लॉक को बंद किया और एक हाथ में तोलिया और दुसरे हाथ में टूथब्रश लिए बड चला बाथरूम की तरफ. जल्दी जल्दी ब्रश किया, नहाया और लग गया अपने बेग में कपडे भरने जैसा की वो हमेशा करता था, वो कहते हैं ना ‘लास्ट मिनट पैकिंग’. वैसे कमरे की उस उथल-पुथल में कपडे ढूँढ़ना आशीष के लिए जितना आसान था शायद किसी और के लिए उतना ही मुश्किल होता. और अगले कुछ ही मिनटों में अपना बैग पैक कर वो जा पहुचा ऑटो स्टैंड.

दूर दूर तक कोई ऑटो दिखाई नहीं दे रहा था, ना ही कोई राहगीर और ना ही छोटे बच्चों की टोलियाँ अठखेलियाँ करते. सर को चकरा देने वाले गरम हवा के थपेड़े सायें-सायें चले जा रहे थे.और ऐसी गर्मी में ऑटो ढूँढ़ना ठीक वैसा ही होता हैं जैसे किसी अँधेरे कमरे में सुई ढूँढ़ना. वैसे अक्सर गर्मियों में छोटे शहरों का कुछ ऐसा ही हाल होता हैं, किराना शॉप हो या किसी शोरूम का मालिक या फिर ऑटोवाला दोपहर का भोजन कर सुकून की नींद निकालने घर जाना सबके लिए जैसे एक दिनचर्या होती है. और गर्मियों में सोना तो जैसे वहां की ‘रूल बुक’ का एक एहम रूल है, जिसे तोडा तो भारी फाइन चुकाना पड़ेगा. इसलिए सभी नियमानुसार दोपहर एक से तीन तक कूलर चालू कर सुकून की नींद निकाल लेते हैं. खैर ये सब जाने दीजिये हमारी कहानी आगे बढ़ाते हैं, कुछ मिनट तपती दोपहरी में तपने के बाद आशीष को एक ऑटो नज़र आया और बहुत मनावने और मिन्नत करने के बाद ऑटो वाले भैया तैयार हुए स्टेशन चलने के लिए. वैसे भी ऐसी गर्मी की दोपहरी में ऑटोवाले किसी रियासत के राजकुमार बन जाते हैं क्यूंकि उन्हें पता होता है आस-पास ऑटो मिलने वाला नहीं इसलिए मनचाहा किराया वसूल करो और ऊपर से नखरे दीखाओ सो अलग. ऐसा ही कुछ आशीष के साथ हुआ, किराये से ३० रुपये ज्यादा देकर और लाख मानावने करके वो पहुंचा रेलवे स्टेशन, जहाँ ट्रेन छूटने में सिर्फ़ दो ही मिनट बाकी थे. जल्दी-जल्दी ऑटोवाले को पैसे देकर वो भागा अपनी ट्रेन पकड़ने राजधानी की रफ़्तार से, उस रफ़्तार से अगर ओलंपिक्स में भागने का मौका मिलता तो आशीष भारत के लिए एक गोल्ड मैडल जरूर ले आता.

जैसे-तैसे ट्रेन में चड़ा तो क्या देखता है ट्रेन खचा-खच भरी हुई है. ट्रेन के हालात देखकर तो यही लगा रहा था मानों अधिकतर लोग गर्मी की छुट्टियां मनाने या तो घर जा रहे थे या फिर अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ. कुछ बच्चे इधर से उधर भाग रहे थे उनके पीछे-पीछे उनके पापा और मम्मी भागे जा रहे थे उन्हें सँभालते हुए. कहीं दूर किसी कोने में एक बूढ़े काका मूंगफली छीलते हुए पुराने ज़माने की कहानियां सुनाये जा रहे थे और उनके सामने बैठे अंकल मुहं बनाकर हाँ, हूँ किये जा रहे थे. उनका चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था मानो जैसे उन्हें किसी ने काका की कहानियां सुनने की सजा दी हो. वहीं दूसरी और की सीट पर एक कपल बैठा हुआ था, हल्की-हल्की आवाज़ में शायद इस खचाखच भरी ट्रेन में भी उन्होंने अपने लिए प्यार के कुछ लम्हे जुगाड़ कर लिए थे. किसी कोने से बच्चे के रोने की आवाज़, किसी तरफ से एक माँ के चिल्लाने की कर्कश ध्वनि, एक तरफ मूंगफली बेचता हाफ पेंट पहने एक लड़का, तो दूसरी और माँ से पॉपकॉर्न लेने के लिए ज़िद करता एक बच्चा. कुल मिलाकर एकदम ऐसा माहौल जिसमे कई कहानियां और कई कहानियों के किरदार बख़ूबी अपना किरदार अदा कर रहे थे बिना किसी शिकायत के. उन्ही कहानियों में से एक कहानी थी आशीष की जो ट्रेन की रफ़्तार जितनी तो नहीं पर ज़िन्दगी की पटरियों पर काफी तेज़ भागे जा रही थी और बेचारा आशीष तालमेल बैठाने की कोशिश में जी जान से लगा हुआ था. काफी मेहनत की, कुछ लोगो से जरा इधर उधर सरक कर जगह देने के लिए मनावने भी किये मगर आशीष की सीट पाने की ख्वाहिश सिर्फ एक ख्वाहिश ही रही. और उसने अपने आप को यह कहकर समझा लिया के भाई सीट पाने की मोह-माया से मुक्त हो जाओ और खड़े-खड़े इस सफ़र का आनंद लो. फिर क्या था अपना बेग सुरक्षित एक कोने में रख वो ऐसी जगह जा कर खड़ा हो गया जहाँ से बेग को देखा जा सके. ट्रेन में सफ़र करो तो यही चिंता रहती है की कहीं कोई आपका सामान ना उठा ले जाए. वैसे आशीष के बेग में कोई हीरे-जवाहरात या सोने के बिस्किट नहीं थे सिर्फ़ कुछ कपडे और घरवालों के लिए ख़रीदे हुए गिफ्ट्स. फिर भी भाई देखरेख जरूरी है, नुक्सान आखिर नुक्सान होता है.

ट्रेन अब रफ़्तार पकड़ चुकी थी और आशीष की कहानी भी, इस कहानी में कई किरदार बगैर इजाज़त ख़लल डाले जा रहें थे, जैसे वो भाईसाहब जो आशीष के बाजू में खड़े थे, उन्हें अपने से ज्यादा जो लोग बैठे थे उनकी चिंता हो रही थी, देखो भाई उन्होंने कैसे कपडे पहने हैं, कैसे बैठे हैं, कैसे बातें कर रहे हैं, उनकी बकबक सुनकर आशीष थोडा परेशान हो गया था इसलिए उसने अपना रामबाण इस्तेमाल किया जो अक्सर वो किया करता है. हैडफ़ोनस, लोगों की बकबक से दिलाये मुक्ति और साथ ही मधुर संगीत की गारंटी. हैडफ़ोनस को मोबाइल से कनेक्ट कर आशीष अपने पसंदीदा गाने सुनते-सुनते, ट्रेन की रफ्तार के साथ पीछे छूट रहे पहाड़, वादियाँ, झरने और पेड़-पोधों को देखकर सफ़र का आनंद उठा रहा था. एक योगी की तरह वो ध्यानमग़न हो चुका था मधुर संगीत, हल्की-हल्की बहती हवा और बाहर के सुकून भरे चित्रों में, बीच-बीच में जरूर उसके इस ध्यान को इक्का-दुक्का लोग तोड़ देते थे जैसे वो छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें सुसु ना भी लगी हो पर ट्रेन में इधर से उधर घूमने के लिए बहाना बनाकर अपने माता-पिता को परेशान करना उन्हें अचछा लगता है. एक मोटे अंकल जो बार-बार थूकने के लिए वाशबेसिन की तरफ रुख किये रहते थे, पता नहीं लोग पान मसाला और गुटका क्यूँ खाते हैं. कभी-कभार इन सबके बीच कोई जाना पहचाना चेहरा भी नज़र आ जाता था आशीष को. जैसे की वो ‘गुड्डू’ महाशय जिनसे आशीष की मुलाकात पिछले ५ सालों में एक बार भी नहीं हुई थी, अचानक ना जाने कहाँ से प्रकट हो गए थे. आशीष तो गुड्डू को पहचान ही नहीं पाया था पर गुड्डू ने उसे पहचान लिया था. कुछ ही देर में उसने अपनी पूरी जन्मकथा बयां कर दी कुछ ही शब्दों में, वो कहाँ से आ रहा है, कहाँ जा रहा है, उसकी शादी कब हुई, किस्से हुई, कितने बच्चे हैं, उनके नाम क्या है, उसने नया घर कब ख़रीदा, किस एरिया में ख़रीदा और कितने का ख़रीदा, ये सब जानने में आशीष की कोई रूचि नहीं थी परंतु करता भी क्या मजबूरी है इसीलिए शान्तिपूर्वक उसकी बकबक सुने जा रहा था. कुछ देर बाद जब वो अपनी कथा सुनाकर थक गया तो उसने आशीष को अपने साथ चलने के लिए कहा इस आश्वासन के साथ के वहां बैठने की जुगाड़ हो जायेगी. प्रस्ताव जोखिम भरा था क्यूँकी गुड्डू भाईसाहब की बकबक सुननी पड़ेगी पर करता भी क्या पूरा सफ़र खड़े-खड़े तो कट नहीं सकता था इसलिए आशीष अपना बेग लेकर गुड्डू भाईसाहब के पीछे-पीछे हो लिया. भाईसाहब की सीट पर पुहंच कर क्या देखता है वहां तो पहले से ही भीड़ लगी है तो उसके बैठने के लिए कहाँ से गुड्डू भाईसाहब जगह बनायेंगे. वो भाईसाहब तो आराम से बैठ गए और आशीष फिर से खड़ा ही रह गया. जल्द ही अगला स्टेशन आने वाला था इसलिए आशीष ने फिर से अपनी जगह गेट के पास फिक्स की और वहीं ताज़ी हवा खाते हुए बाहर के चित्रों का आनंद लेने लगा. ट्रेन की रफ़्तार अब कुछ कम होने लगी थी और कुछ ही मिनटों में ट्रेन एक हलके से झटके के साथ रुक गई, आशीष ने बाहर झांक कर देखा तो कोई स्टेशन था, स्टेशन छोटा सा था इसलिए वहां से ज्यादा लोग तो नहीं मगर इक्का दुक्का लोग ही ट्रेन में चडे और उन्ही में से एक थी आशीष की कहानी की नायिका.

कहानी आगे जारी रहेगी…

अभिमन्यु और चक्रव्यूह

युद्धभूमि सूरज की लालिमा से जगमगा रही है, प्रचंड शोर, पृथ्वी से उड़ती धूल, घोड़ों के टापुओं के तीव्र स्वर और धनुष की टंकार गूँज रही है युद्धभूमि में. एक तरफ जहाँ महासागर जैसा विशाल सैनिक दल, जिसका नेत्रत्व गुरुओं में सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रौण कर रहे हैं, जिनके साथ देने अनेक महायोद्धा जिनमे हैं सुर्यपुत्र कर्ण, दुशासन, दुर्योधन, अश्वत्थामा, मद्रनरेश, कुलगुरु और शकुनी तत्पर हैं. वही दूसरी और पांडव, श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में बड़ी से बड़ी विपत्ति से लड़ने में सक्षम युद्ध के शंखनाद की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

आज सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रौण ने चक्रव्यूह की रचना विशेष रूप से युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध को आज ही समाप्त करने के उद्देश्य से की है, परंतु इसमे सबसे बड़ी बाधा है धनुर्धारी अर्जुन, जो इस चक्रव्यूह को तहस-नहस करना भलीभाती जानता है. पर शकुनी और दुर्योधन ने अपनी कुटिलनीती से पहले ही अर्जुन को युद्धभूमि से कोसो दूर दूसरे प्रायोजन से भेजने का प्रबन्ध किया हुआ है ताकि उन्हे युधिष्ठिर को बँधी बनाने में किसी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े. शंखनाद से युद्ध की घोषणा होते ही जैसे पांडव पक्ष किसी दुविधा में फस गये, उन्हे इस समस्या का कोई उपाय सूझ ही नहीं रहा था, तभी उनकी इस चिंता का उपाय बनकर अभिमन्यु सामने आता है.

अभिमन्यु: ज्येष्ठ पिताश्री मुझे आज्ञा दीजिए मुझे चक्रव्यूह के अंदर प्रवेश करने का मार्ग ज्ञात हैं, मैने श्री कृष्ण से सुना था.

युधिष्ठिर: नहीं अभिमन्यु, में तुम्हे चक्रव्यूह में प्रवेश की आज्ञा नहीं दे सकता. ये अनुचित होगा.

अभिमन्यु: अनुचित तो तब होगा ज्येष्ठ पिताश्री, जब हम गुरु द्रौण की चुनौती का उत्तर नहीं देंगे.

युधिष्ठिर: नहीं में तुम्हे आज्ञा नहीं दे सकता, तुम्हारी सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है.

अभिमन्यु: मुझे भला आप सभी के होते क्या हो सकता है, पिताश्री.

युधिष्ठिर: नहीं अभिमन्यु फिर भी में तुम्हे चक्व्यूह में प्रवेश की आज्ञा नहीं दे सकता.

अभिमन्यु: परन्तु क्यूँ पिताश्री, क्या आपको मेरे युद्ध कौशल पर भरोसा नहीं. क्या आपको लगता है में कौरव सेना का सामना नहीं कर सकता. अपने शब्दों के लिए क्षमा चाहता हूँ पिताश्री, पर आप शायद भूल रहे हैं में श्री कृष्ण का शिष्य और महान धनुर्धारी अर्जुन का पुत्र हूँ. मुझमें भी असीम सहास और वीरता का संचार करता पांडव वंश का रक्त बह रहा है.

युधिष्ठिर: पुत्र मुझे तुम्हारी वीरता और सहास पर तनिक भी संदेह नहीं परन्तु.

अभिमन्यु: परन्तु क्या पिताश्री.

युधिष्ठिर: परन्तु, विपक्षी पक्ष में गुरु द्रौण, कर्ण और दुर्योधन जैसे महान योध्या है, जिनका सामना करने से स्वयं देवता भी डरते हैं.

अभिमन्यु: पिताश्री, ये सभी योध्या गत दिवस मेरे तीखे बाणों का स्वाद चख चुके हैं और मुझे पूर्ण विश्वास है में इन्हें आज भी अपने तीखे बाणों से परास्त कर सकता हूँ. और आप सभी भी तो होंगे मेरे साथ तो भयभीत होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं.

युधिष्ठिर: परंतु अभिमन्यु तुम्हे सिर्फ़ प्रवेश का मार्ग ज्ञात है और इस परिस्थिति में तुम्हारा चक्व्यूह में प्रवेश करना जोखिम भरा हो सकता है और अगर तुम्हे कुछ हो गया तो में अर्जुन को क्या जवाब दूंगा.

अभिमन्यु: उचित कहा पिताश्री मुझे सिर्फ प्रवेश का मार्ग ज्ञात है परन्तु पिताश्री आप शायद मेरी चिंता में इस बात को भूल गए की जिसके साथ गदाधारी भीम जिनकी गदा एक ही वार में बड़े से बड़े वीर को वीरगति दे देती है, नकुल और सहदेव जिनकी तलवारबाजी से स्वयं देवता भी डरते हैं और स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर जिनका भाला बड़े से बड़े शूरवीर को एक वार में मृत्यु के घाट उतर सकता है, उनके रहते मेरे साथ कैसे कोई अनहोनी हो सकती है.

युधिष्ठिर: परन्तु अभिमन्यु

अभिमन्यु: किन्तु, परन्तु जैसे शब्दों का इस युध्भूमि में कोई स्थान ही नहीं पिताश्री, अब कृप्या मुझे आज्ञा दीजिये चक्व्यूह में प्रवेश ही.

युधिष्ठिर: विजयीभवा: तुम आगे चलो हम तुम्हारे पीछे ही हैं.

अभिमन्यु: जी पिताश्री

युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर अभिमन्यु चक्रव्युह की पहली, दूसरी और आगे कई पंक्तियों को तोड़ता चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया.

नोट: यह वार्तालाप महाभारत से जुडी कहानियों से प्रेरणा लेता है, इसमें सभी समीकरणों को जोड़कर एक वार्तालाप के रूप में पेश करने की कोशिश की गई है. इस वार्तालाप का उदेश्य किसी वर्ग, संप्रदाय, राजनितिक दल, समाज के किसी भी वर्ग और व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ढेस पहुंचाना बिल्कुल भी नहीं है.

ज़िन्दगी को तू चेस कर ले

जितना चाहे सूरज को तक ले
खाली पड़ी जेबों को उम्मीद की दौलत से भर ले
थोडा सही वक़्त का वेट तू करले

ज़िन्दगी को तू चेस कर ले
ज़िन्दगी को तू चेस कर ले…

आँखों में ख़्वाबों का सुरमा लगा ले
होटों पे जीत का गीत सजा ले

ज़िन्दगी को तू चेस कर ले
ज़िन्दगी को तू चेस कर ले…

थोडा सा इरादों को टाइट करले
रेनबो को रंगीली शीशियों में भरले

ज़िन्दगी को तू चेस कर ले
ज़िन्दगी को तू चेस कर ले…